रविवार, 30 जून 2013

YAADEN (95) यादें (९५)

जम्मू गंगयाल में रहकर मैंने बेकरी का कम अच्छी तरह सीखा; दादा दुर्गादास जी, दादी प्रेम देवी, चाचा मंगत राम, बुआ सत्यादेवी, उनका कारीगर रमेश उम्र में मुझसे छोटा था; मैं उसे छोटे भाई की तरह ही व्यवहार करता था; दादा जी बहुत CIGARETTE पीते थे, मैं उस ज़माने से देखता आया था , नानुवाला में LAMP फिर वर-चक्र,
पंजाबी में एक चुटकुला भी चलता था : -
 पाणी पीओ, पम्प दा !    ਪਾਣੀ ਪਿਓ ਪੰਪ ਦਾ !
सिगरट पीओ लम्प दा !! ਸਿਗਰੇਟ ਪਿਓ ਲੰਪ ਦਾ !!
एक शाम दादा जी को कुछ घबराहट हुई; हम सब घर पर ही थे;
जो कुछ भी उपचार करना था किया; जब वे कुछ स्वस्थ हुए , तो मुँह की गाली के साथ सिगरेट की डब्बी फेंक दी; एह छड्डी !!! ਇਹ ਛੱਡੀ !!!
उस दिन के बाद उन्होंने  कभी सिगरेट नहीं पी !
मैं उनकी उस दिन की इच्छा-शक्ति का कायल हो गया था !
1999 में जब मैं हिन्दुमलकोट था, कारगिल की लड़ाई के कुछ दिन बाद उनका जम्मू में ही देहांत हुआ !



जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
Ashok 9414094991, Tehsildar ; Sri Vijay Nagar 335704 
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रविवार, 23 जून 2013

YAADEN (94) यादें (९४)

मेरे पढ़ाई छोड़ने पर सबसे ज्यादा सदमा अशोक जौहर को लगा था; कई महीने तक उसके बुलावे आते रहे थे; पत्रों में वो आस-पास के सारे हालात लिखता था, उसके हरेक वाक्य उदासी झलकती थी; ये ख़त-ओ-ख़िताब कई साल चलते रहे, जब भी डोईवाला जाता हूँ, उससे तो मिलता ही हूँ;
उसमें घमण्ड बिलकुल नहीं है, बात करता है, तो मासूम और सरल; हम जब भी इकट्ठे होते थे, वह खुद खाए या न खाए मुझे जबरदस्ती कुछ न कुछ खिलाने की कोशिश करता रहता था;  सबसे खास बात ये की उसने खुद मुझे दोस्त चुना था; हालाँकि उसकी सगी बहन नीरू बाला, और ताया मदनमोहन जी की बेटी किरण बाला IX से XII तक मेरी सहपाठी रही हैं; HIGH-SCHOOL में तो हम इकट्ठे IX C, X C में BIOLOGY में थे, INTERMEDIATE में मैं MATHEMATICS, PHYSICS  XI C, XII C में था, वे ZOOLOGY BOTANY में थीं; पर हिंदी, ENGLISH, और CHEMISTRY के पीरियड्स इकट्ठे ही थे; उन दोनों से 1974 के बाद मुलाकात नहीं हुई;
अशोक एक सफल व्यापारी है : -
JOHAR IRON STORE, CHOWK BAZAR; DOIWALA 128140


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रविवार, 16 जून 2013

YAADEN (93) यादें (९३)

श्रीगुरु राम राय कॉलेज में मेरा तकरीबन दो-ढाई महीने ही पढना हो सका; उस समय मेरी शकुन्तला मौसी और मौसा हरीशरण आनंद, कांवली रोड, खुड़बुड़ा मोहल्ला में रहते थे; मैं कभी-कभार उनसे मिलने चला जाता था; दशहरे के छुट्टियो में, मैं शकुंतला मौसी और उनके बेटे राजू को साथ लेकर नानुवाला आया; यहाँ आने के बाद मुझे लगा कि छात्र-आन्दोलन, राजनीति, के चक्कर में अपना समय बरबाद करने की बजाय कुछ कारोबार करना चाहिए; और इस सोच के आते ही, मेरा मन पढाई से उचाट हो गया; मैंने अपना इरादा माँ-बाप पर प्रकट किया, पहले तो उन्होंने मुझे समझाने की कोशिश की; पर जब मैंने आन्दोलन के चलते अक्सर कॉलेज में छुट्टी होने, और पढाई न होने का बताया, तो वे मेरे इरादे से सहमत हो गए ; इसके साथ ही मैंने यह भी बता दिया  कि मैं जम्मू जाकर BAKERY का काम सीखूंगा;
कुछ दिन घर रह कर मैं मौसी और उनके बेटे के साथ रवाना हुआ, रायसिंह नगर से दोपहर 1 बजे RAIL से श्रीगंगानगर वहां से शाम 6 बजे CHANDIGARH EXPRESS (जो आजकल बाड़मेर जाती है) उनको अम्बाला से सहारनपुर जाना था, और मुझे आधी रात को धूरी से लुधियाना की गाड़ी पकडनी थी, धूरी पता चला रात वाली गाड़ी बंद है; तो मैं राजपुरा तक उसी गाड़ी में गया, वहाँ से मुझे सीधे जम्मू के लिया SRINAGAR EXPRESS  मिल गयी;
 इस तरह मेरी ज़िन्दगी में अप्रत्याशित TURNIG-PONIT आ गया;

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रविवार, 9 जून 2013

YAADEN (92) यादें (९२)

अशोक जौहर, सुखदेव सिंह, कमल किशोर जोशी और चमनलाल दत्ता, मुझसे एक कक्षा आगे थे; चमन के पिता श्री चुनीलाल मेहता, मेरे माता-पिता के पुराने परिचित थे, IX के बाद X में मैं डोईवाला रहने लगा तो, हमारे घर भी पास-पास थे, मैंने उसे बड़े भाई का दर्जा दिया; पढाई में तो होशियार था ही, सौम्यता में भी मुझसे श्रेष्ठ था;
Intermediate के बाद जब हम देहरादून पढ़ते थे, तो भी रेलगाड़ी में साथ ही आना-जाना होता था;  देहरादून छोड़ने के बाद भी हमारे ख़त-ओ-ख़िताब चलते रहे, फिर शायद 1980 मैं दिल्ली गया, तो RK Puram में वह अपने बड़े भाई-भाभी के पास रहता था, मैं मिलने गया था; उसके बाद मुलाकात नहीं हुई; वह civil court देहरादून में steno है;    
अशोक जौहर से डोईवाला जाने पर मुलाकात होती ही रहती है; सुखदेव सिंह का गाँव खैरी है, एक बार उसके घर भी जाकर आया था, कमल किशोर जोशी के पिताजी डोईवाला block में सेवारत थे, उससे पत्र-व्यवहार एक-दो साल चलता रहा; बाद में बंद हो गया; 
इंटरमीडिएट परीक्षा के दौरान सुखदेव, कमल किशोर और मैंने देहरादून में इकट्ठी फोटो खिंचवाई थी; उसके पीछे मैंने लिखा था-
ये जवानी, ये लड़कपन सब बदल जायेगा !     یہ جوانی، یہ لداکپن، سب بدل جاےگا؛
यादगार  में ,  इक  फोटो  ही  रह  जायेगा !!     یادگار میں،  یک فوٹو ہی، ررہ جاےگا   

लगता नहीं, कि 39 साल बीत गये हों !



जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 2 जून 2013

YAADEN (91) यादें (९१)

देहरादून में DBS और DAV कॉलेज पढाई और अनुशासन की दृष्टि से अच्छी साख वाले थे; पर ये दोनों PG COLLEGE RAILWAY STATION से तकरीबन 4-5 किलोमीटर उत्तर दिशा में सहस्त्र-धारा जाने वाली DL ROAD पर है; इसी कारण डोईवाला की तरफ से जाने वाले अधिकांश विद्यार्थी हरिद्वार रोड पर RACE-COURSE से पश्चिम दिशा में  RAILWAY-LINE और सहारनपुर के बीच में स्थित, श्रीगुरु रामराय PG COLLEGE   में ही पढ़ते थे;
 अगस्त 1974 में कॉलेज खुलने पर, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले, छात्र आन्दोलन के अनिश्चय की स्थिति में ही,    मैंने भी BSc (maths) में दाखिला ले लिया; उस समय स्वामसिंह तोमर Principal थे; उनके हाथ का जारी IDENTITY-CARD बहुत बाद तक मैंने यादगार रखी थी; जिस पर उन्होंने खुद्कलम लिखा था-
Valid upto 30 June 1975    
हमसे पहले तक देहरादून जिला MEERUT UNIVERSITY में था; उसमें SEMESTER SYSTEM  था, पर अब GARHWAL UNIVERSITY श्रीनगर नई बन गई थी; इसमें YEAR SYSTEM लागु किया गया; इस कारण SENIORs और हममें अंतर हो गया था;
अशोक जौहर और मैं SGRR मे थे, चमनलाल दत्ता पहले से ही DBS में था; मुझे पक्का याद
नहीं, पर शायद देहरादून से डोईवाला (20 KM)  MST एक महीने की 4 रुपये, और तीन महीने की 9 रुपये में बनती थी;
डोईवाला से अमूनम हम 41 UP मसूरी एक्सप्रेस (दिल्ली) से सुबह 8 बजे चलते थे, वापसी देहरादून से दोपहर 2.40 अमृतसर पसेंजर (लाहौरी) से चलते थे, हर्रावाला में बच्चे टोकरियों में अमरुद बेचने आते थे, पांच-दस पैसे में एक-दो , या फिर 30-40 पैसे में पूरी टोकरी तकरीबन 1 Kg हम ले लेते थे; .        

  जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
 Ashok, Tehsildar  Srivijaynagar  9414094991

रविवार, 26 मई 2013

YAADEN (90) यादें(९०)

1974 में राष्ट्रीय रंगमंच पर अप्रत्याशित घटना-क्रम हुआ; रायबरेली से इंदिरागांधी के विरुद्ध 1971 के लोकसभा चुनाव में पराजित प्रत्याशी राजनारायण की याचिका पर इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग तथा चुनाव में भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने पर  इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध करार दिया; तथा अगले 6 साल तक चुनाव के अयोग्य घोषित कर दिया !
 एकदम से राष्ट्रीय  राजनीति में भूचाल आ गया था;  इंदिरा गाँधी के प्रधान-मंत्री पद से इस्तीफे की जबरदस्त मांग उठी; congress अध्यक्ष देवराज उर्स ने  प्रधान-मंत्री के इस्तीफ़ा देने की बजाय संसद में निर्वाचन सम्बन्धी संशोधन विधेयक पारित करवाने का इरादा किया; 
इसके विरोध में जबरदस्त लहर चली, जिससे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में, बिहार व उत्तर प्रदेश का छात्र आंदोलन चला, छात्रों ने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया; 1974 का शिक्षा-सत्र जुलाई की बजाय अगस्त में शुरू हुआ;  पर अनिश्चय की स्थिति बरकरार रही; 
यह 1975 के आपात-काल का बीजारोपण था;


जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 19 मई 2013

YAADEN (89) यादें(८९)

 कोई महीना भर जम्मू में रिश्तेदारों से मिल-मिलाकर, मैं 1974 की गर्मियों में अपने घर नानुवाला आ गया; इंटरमीडिएट के RESULT के बाद वापस भानियावाला  चला गया;
उस वक़्त एक अजीब बात ये हुई, कि हम लोग जो TOPPER थे, वे BSc में दाखिले के लिए भागे; और जो पीछे BSc में दाखिले की ना-उम्मीदगी वाले थे, वे रुड़की जाकर ROURKEE ENGINEERING COLLEGE  में दाखिल हो गये ! आज के परिप्रेक्ष्य में यह बिल्कुल उल्टी बात लगती है;


वक़्त वक़्त की बात है,  وقت-وقت کی بات ہے  
समय बड़ा बलवान !     وقت بدا بلوان ہے 
رفی صاحب کی زبان میں- रफ़ी साहब की जुबान में-
कौन जाने किस घडी वक़्त का बदले मिज़ाज  !! کون جانے کس گھڈی وقت کا بدلے مزاج



जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦसे 
Ashok 9414094991, Tehsildar ; Sri Vijay Nagar 335704
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रविवार, 12 मई 2013

YAADEN (88) यादें(८८)

तस्वीर
अप्रैल 1974 के तीसरे सप्ताह में अमृतसर passenger (लाहौरी गाड़ी) से मैं डोईवाला से लक्सर तक आया, और वहां से Sealdah express पकड़कर सुबह जम्मू तवी स्टेशन उतरा, वहां से सतवारी होकर डिग्याना , ठीक वह जगह जहाँ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1A के पत्थर पर लिखा था, पठानकोट 101, जालंधर 217,   जम्मू 9, श्रीनगर 303 KM; 
दादा दुर्गादास जी दादी प्रेम, चाचा मंगतराम जी, और मेरी बुआ सत्यादेवी, सब मेरे आने से खुश थे, उस दरम्यान मैं दादी जी के साथ वैष्णो-देवी के दर्शन करने गया, जो मेरी पहली यात्रा थी; और जम्मू दूसरी बार आया था; 

जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦसे 
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रविवार, 5 मई 2013

YAADEN (87) यादें(८७)

HIGH-SCHOOL, INTERMEDIATE (1970-74) में पढाई के दौरान मैंने काफी फ़िल्में देखीं कई बार तो पहला दिन, पहला SHOW!उस वक़्त FILM TICKETS  BLACK का चलन था; कुछ तो बेहतरीन फ़िल्में थीं- वक़्त, फूल और पत्थर, परिचय, पवित्र-पापी, सौदागर, यादगार, शहीद, हिंदुस्तान की कसम, राम और श्याम, आराधना, हाथी मेरे साथी, खानदान, दो कलियाँ, नया ज़माना, कोरा कागज़, आंधी, अधिकार, दुश्मन, अनुराग, इम्तिहान; कोई FILM ऐसी नहीं थी, जिसमें आंसू न आए हों !

FILM Actors में बलराज साहनी, संजीव कुमार, प्राण, मनोज कुमार, राजकुमार, अशोककुमार,   JUNIOR महमूद, MASTER सत्यजीत,  ACTRESS में मीनाकुमारी, नंदा, नूतन, जया भादुड़ी (बच्चन) और राखी, की अदाकारी मुझे पसंद थी;
वक़्त में बलराज साहनी और राजकुमार, दुश्मन तथा फूल और पत्थर में मीनाकुमारी, परिचय में जीतेंद्र, प्राण और जया भादुड़ी, पवित्र पापी में अजय(परीक्षित) साहनी, सौदागर में नूतन, शहीद में प्रेम चोपड़ा, यादगार में नूतन, मनोज कुमार, और JUNIOR महमूद, हिन्दुद्स्तान की कसम और हँसते ज़ख्म में प्रिया राजवंश, राम और श्याम में दिलीप साहब, कोरा कागज़ में विजय आनंद और जया भादुड़ी, आंधी में संजीवकुमार और सुचित्रा सेन, अधिकार में नंदा, इम्तिहान में विनोद खन्ना, नया ज़माना, और दोस्त में धर्मेन्द्र   वाक़ई लाजवाब हैं;

जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦसे 
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रविवार, 28 अप्रैल 2013

YAADEN (86) यादें(८६)

INERMEDIATE के दोनों साल ( XI व XII ) में अंग्रेजी वेदप्रकाश जी पढ़ाते थे, XI में कभी कभी PRINCIPAL साहब, चन्द्रलाल जी शाह भी पढ़ाते थे, मुझे अच्छी तरह याद है, KING KOBRA IN THE BUNGALOW  उन्होंने ही हमें पढाया था; उसी दरम्यान PIC का PENAL INSPECTION भी हुआ था, याद नहीं कि, आने वाले शिक्षाविद थे, या कि अधिकारी, लगातार तीन दिन उस दल ने निरीक्षण किया था;  अंतिम दिन प्रार्थना-सभा में उन्होंने हमें शिक्षा दी -
 खूब खाओ, खूब खेलो, खूब पढो !
1974 में ही हरिद्वार में कुम्भ का मेला था; उसमें मैं और केशर सिंह गये थे, उस वक़्त र 1.50 तक चाय का कप बिका था; हम दोनों रात को देर तक घूमते रहते थे; ONE WAY TRAFIC था, गलती से अगर कोई सड़क मुड़ तो फिर एक दो किलोमीटर का चक्कर पड़ जाता था;
और इस तरह मेरी इंटरमीडिएट तक की पढाई पूरी हो गयी; परीक्षा-परिणाम आना बाकी था; और अप्रैल के तीसरे सप्ताह में, मैं जम्मू चला गया;

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रविवार, 21 अप्रैल 2013

YAADEN (85) यादें(८५)

पब्लिक इंटरमीडिएट के दौरान ही जादूगर PC SARKAR के SHOW डोईवाला में हुए; SUGAR MILL में रामलीला देखने, अक्सर मैं और केशर सिंह इकट्ठे जाते थे, 1974 में हरिद्वार में चलने वाली रामलीला में केशर सिंह जी के पिता रोशनलाल जी  और छोटा भाई बाबूलाल भी पात्र के रूप में थे;  हम दोनों रात को 8 बजे DLS पैसेंजर पकड़ कर डोईवाला से हरिद्वार चले जाते थे; सुबह दून एक्सप्रेस से ६ बजे वापस डोईवाला पहुँच जाते थे;
हमसे पहले PUBLIC INTERMEDIATE COLLEGE डोईवाला में इंटरमीडिएट परीक्षा में किसी की प्रथम श्रेणी नहीं आई थी; हम लोगो में जबरदस्त मुकाबला तो था ही, पर एक बात मुझे अजीब लगती थी कि, राजस्थान में जब मैं किसी से बात करता था तो वे प्राप्तांक ७० % या अधिक बताते थे, जबकि HIGH SCHOOL में मेरे हिंदी में 58 और अंग्रेजी में 48 ही आये थे;  बातचीत में मुझे लगता था , हमारी पढाई का दर्जा निश्चय ही उनसे बेहतर था; तो भी UP मे कम और राजस्थान में अधिक नंबर आते है; तो इसका अर्थ है कि, राजस्थान की परीक्षा प्रणाली उचित नहीं है; क्योकि यहाँ जो हिंदी, अंग्रेजी, गणित ऐच्छिक पाठ्यक्रम थे, वे हमारे अनिवार्य थे; इसके अलावा अंग्रेजी से अंग्रेजी  PROSE POETRY EXPLANATION REFERENCE  WITH CONTEXT; तृतीय भाषा के बजाय हिंदी विषय में ही शुद्ध संस्कृत का एक प्रश्न-पत्र; ये सब राजस्थान में नहीं थे;    

इंटरमीडिएट परीक्षा १९७४ हमारा परीक्षा SGN खालसा इंटरमीडिएट कॉलेज देहरादून में था; केशरसिंह जी उसी में अध्यापक थे; मैं देहरादून उन्ही के पास रुका था; फिर इतिहास रचा गया; माध्यमिक शिक्षा परिषद् उत्तर प्रदेश इलाहबाद की इंटरमीडिएट परीक्षा में PIC डोईवाला के एक साथ चार विद्यार्थियों ने प्रथम श्रेणी प्राप्त की; किरण बाला जौहर, कमलराज अरोड़ा, यशपाल सिंह और मैं;

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रविवार, 14 अप्रैल 2013

YAADEN (84) यादें (८४)

डोईवाला रिहायश के दौरान मैं सुबह railway-line से पार पश्चिम में, शाखा (राष्ट्रीय स्वयं-संघ) में जाने लगा था; प्रातः कालीन वे गतिविधियाँ मुझे पसंद थीं;  भानियावाला आने के बाद, यहाँ भी शाखा शुरू हो गयी थी; बड़े मामाजी की प्रेरणा से मैं सुबह जाने लगा था;  बड़े मामाजी ने तो 1963-64 में ही रायसिंह नगर से डॉक्टर हेडगवार और गुरु गोवेलकर की तस्वीरें लाकर नानुवाला घर में लगाई थीं;      
1974 तक RAILWAY में Ist, IInd, और IIIrd तीन श्रेणियां थीं; स्लीपर के लिए रात 9 से सुबह 6 बजे तक 3rd के ticket पर र 2.50 अतिरिक्त देना होता था; 1974 के rail-budget में IIIrd class समाप्त करने की घोषणा हुई;
INTERMEDIATE में हमारा परीक्षा केंद्र SGN KHALSA INTERMEDIATE COLLEGE देहरादून था; मैं केशर सिंह जी के पास रुक गया था; 1 अप्रैल को सुबह मैं केसरसिंह जी को जबदस्ती RAILWAY STATION ले गया; वहां जाकर देखा, तो डिब्बों पर III का एक डंडा मिटाकर II बना दिया था, II का एक डंडा मिटाकर I बना दिया था;
सोचता हूँ तीसरा दर्जा ख़त्म करके, दो ही किये थे; पर आज तो रेलवे में IInd, sleeper, Ist, AC Chair car, AC IIIrd , AC IInd , और AC Ist कुल 7 दर्जे हैं; चौबे जी, दुबे की बजाय छब्बे ही बन गए हैं; 
क्या हमारे संविधान में समानता और समाजवाद की यही परिकल्पना थी ?


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रविवार, 7 अप्रैल 2013

YAADEN (83) यादें (८३)

Intermediate में हमारे साथ कुछ SENIOR साथी भी शामिल हो गए थे; हालाँकि मेरा ये आकलन रहा है; कि वे सभी पढाई में कमज़ोर नहीं थे; अशोक कुमार जौहर; श्रवण कुमार अग्रवाल; सुखदेव सिंह, कमल किशोर व्यास और रामनिवास गुप्ता , ये सब XII में हमारे साथ हो गए थे; और मेरे मित्र थे, मैंने सबको बड़े भाई का दर्जा दिया, मुझे इनके अनुभव का काफी फायदा मिला; अशोक जौहर, नीरू का बड़ा भाई है; वह DIVISION IMPROVE के लिए हमारे साथ आया था;
  सुखदेवसिंह को सब BRILLIANT मानते थे; वह क्यों FAIL हुआ ? यह अचरज था; वैसे वह SELF-CONFUSED रहता था; उसका गाँव खैरी है. हम दोस्त लोग उसे HALF-MIND कहते थे; वह हमारी बात का गुस्सा नहीं मानता था; congress का आलोचक होते हुए भी वह हिमाचल के प्रथम मुख्य-मंत्री यशवंत सिंह परमार का प्रशंसक था, हिमाचल केंद्र-शासित से पूर्ण राज्य बन चुका था; चुनाव प्रचार के लिए परमार साहब आये, हम दोनों भाषण सुनने गये थे;  श्रवण और रामनिवास (पूरण चंद आत्माराम) तो पक्के बनिया थे; अशोक चौक बाज़ार में JOHAR IRON STORE चलाता है;

उसी दरम्यान डोईवाला को TOWN-AREA बनाने का आन्दोलन बड़े जोर-शोर से चला, पाशो राम पान वाले संघर्ष-समिति के संयोजक थे; हमारे PRINCIPAL साहब CL SHAH का भाषण मुझे आज भी याद है :-

जैसे बच्चा छोटे से बड़ा होता है, वैसे ही डोईवाला, पहले बच्चा था, अब बड़ा हो गया है;

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रविवार, 31 मार्च 2013

YAADEN (82) यादें(८२)

XII में बड़े दिनों की छुट्टियाँ होने पर;  31 दिसंबर 1973 को मैं भानियावाला से देहरादून होकर सहारनपुर तक बस पर पहुंचा।  RAILWAY के LOCO RUNNING -STAFF की हड़ताल चल रही थी, सुबह की अख़बार में खबर आ गई थी कि, आज हड़ताल टूट जावेगी,  सहारनपुर से शाम छः बजे चलने वाली Shuttle जाने के आसार न होने के कारण, वाया यमुनानगर, अम्बाला तक बस पर आना पड़ा, अम्बाला छावनी  RAILWAY-STATION पर आकर पता चला हड़ताल टूट गई है, वहीँ पर मुझे दो साथी मिल गए, एक बापू बाज़ार जयपुर के थे, जिनको नंगल डैम जाना था, उनका नाम मुझे याद नहीं, दूसरे कुरुक्षेत्र में ENGINEERING पढने वाले श्रीविजयनगर के कैलाश मिड्ढा थे;  हम तीन राजस्थानी अनायास ही मिल गए, मैं उन दोनों से छोटा था, 

अम्बाला से बठिंडा के लिए रात 10 बजे चंडीगढ़ एक्सप्रेस चलती थी, जो बठिंडा से PASSENGER के रूप में श्रीगंगानगर सुबह 10 बजे पहुँचती थी, (वर्तमान कालका बाड़मेर; एक्सप्रेस)  उस समय बठिंडा- सूरतगढ़-बीकानेर-जोधपुर-बाड़मेर METER-LINE थी, पूछताछ पर लिखा था- 31.12.73 को बठिंडा की तरफ कोई गाड़ी नहीं है, पहले तो हम निराश हुए, फिर मैंने कहा कि, रात 2 बजे अम्बाला फिरोजपुर पैसेंजर वाया बठिंडा जाती है, वह तो अगला दिन हो जायेगा, हम पुनः आशान्वित हो गए, नंगल की बस सुबह 4 बजे जानी थी, 

हमने होटल में खाना खाया, मैंने और कैलाश ने MUTTON खाया, तीसरे साथी ने पालक-पनीर खाया, कुल 9 रुपये 60 पैसे, मुझे याद है, हम तीनों ने FILM यादों की बारात देखी{धर्मेन्द्र, विजय अरोड़ा, अजीत, सत्येन कप्पू, जीनत अमान, नीतूसिंह, नंदा, आमिर खान (मास्टर आमिर )} इसी दौरान हमने एक-दूसरे  को HAPPY NEW YEAR भी कहा;   रात 1 बजे STATION पहुंचे तो फिर लिखा था, बठिंडा की तरफ गाड़ी नहीं है, मैंने ALL INDIA RAILWAY TIME-TABLE ख़रीदा कैलाश ने उस पर हम तीनों के नाम और तारीख लिखी; मैंने उसे लगभग 1990 तक संभल कर रखा था;  

नंगल वाले साथी को 4 बजे से पहले ही बस मिल गयी; हमें पता चला की गंगानगर की सीधी बस नहीं है, पटियाला से मिल जाएगी , करीब 4.45 बजे हमें पटियाला की बस मिली, जब तक पटियाला पहुंचे, गंगानगर की बस जा चुकी थी, बठिंडा की बस पकड़ी, जो संगरूर सुनाम होती हुई आई; बठिंडा से गंगानगर की बस तो मिल गयी, लेकिन गंगानगर पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी; आगे साधन नहीं था, हम दोनों RAILWAY-STATION के सामने एक होटल में चारपाई बिस्तर लेकर सो गए, शायद 2-2  रूपये, या फिर कम में. 

 सुबह बस पर हम रायसिंहनगर पहुंचे , विजयनगर की बस पकड़ी , अम्बाला में मैंने कैलाश को जो PEN दिया था, वो नीरुबाला जौहर का था; मैं उहापोह में था कि, डोईवाला जाकर नीरू को लौटाना  है; आखिर मैंने जी कड़ा करके कैलाश से PEN वापस ले ही लिया, पर मन में ग्लानि थी कि, कैलाश क्या सोच रहा होगा ?  नानुवाला के अड्डे पर मैं उतर गया; कैलाश मिड्ढा विजयनगर चला गया, 

 बादमें  कैलाश मिड्ढा से मुलाकात या बात नहीं हो पाई, 2001 में, जब मैं अनूपगढ़ नायब-तहसीलदार था, तो पता चला की, वो सूरतगढ़ THERMAL में है, मैंने एक POST-CARD लिखा था, जिसका जवाब नहीं आया; सितम्बर 2012 में विजयनगर आने के बाद पूछताछ की तो पता चला, वो दिल्ली चले गए, फ़ोन नंबर जानने की कोशिश की पर पता नहीं लगा;

जीवन के सफ़र में राही,
 मिलते हैं बिछुड़ जाने को !
 और दे जाते हैं यादें,
जीवन भर तड़फाने को !


जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦ
Ashok 9414094991, Tehsildar ; Sri Vijay Nagar 335704
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रविवार, 24 मार्च 2013

YAADEN (81) यादें (८१)

XI उत्तीर्ण करने के बाद मई 1973 में मैं नानुवाला आया, उसी समय चाचा मदनलाल जी की शादी थी; बारात अल्लापुर (अलवर) जानी थी; मैं, पिताजी, फूफा कस्तूरी लाल जी,  विश्वनाथ का बड़ा भाई सुखदेव (बिल्लू), उनके पिताजी चूनीलाल, पंडित तीरथराम जी, करनैल सिंह, और धनीराम जी का दामाद सुरेन्द्रकुमार आहूजा, आँधियों के कारण रेलगाड़ी का समय अनिश्चित था;
रायसिंहनगर से बस पर गंगानगर, फिर बस पर हनुमानगढ़, आगे शाम छः बजे दिल्ली के डिब्बे में सादुलपुर और  रेवाड़ी, वहां से अलवर, स्टेशन के पास एक धर्मशाला में हम रुके, वहां से एक जोंगा लेकर हम अल्लापुर पहुंचे, ये मेरी अलवर या अल्लापुर की पहली यात्रा थी, हालाँकि बचपन से ही मैं वहाँ के किस्से सुनता आया था;
 वहाँ रात के खाने में राजमाष-चावल खाए, पता नहीं क्यों मुझे बहुत ही स्वाद लगे; वैसे स्वाद वाले राजमाष-चावल फिर मैंने कभी नहीं खाए;

होली की शुभकामनायें !
HAPPY HOLI 
ਸਰੇਯਾਂ ਨੂੰ ਹੋਲੀ ਦੀਯਾਂ ਵਾਧਾਯੀਆਂ !!
آپ سب کو ہولی کی مبارکباد 

जयहिंद جیہینڈ ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 17 मार्च 2013

YAADEN (80) यादें (८०)

जब हम IX C में थे, तो हिंदी के अध्यापक सोहनलाल शर्मा हमारे CLASS TEACHER थे।  XI  C दक्षिण दिशा वाले ऊपर के कमरे में थी। जबकि हमें XI  C में पुरानी IX C की लाइन में उससे पश्चिम वाला कमरा मिला। कुछ दिन हमने BD NETHANI और सत्यपाल अरोड़ा जी से विरोध भी किया।   यानी के XI  C में हमर CLASS-ROOM भवन के उत्तर-पश्चिम में नीचे वाला, दक्षिण को खुलता हुआ था। 
सत्यपाल अरोड़ा XI हमें PHYSICS पढ़ाते थे; वे Q क्यू को क्यऊ बोलते थे; उन्होंने ऐलान किया था कि, सालभर में जिसके PHYSIC में सबसे ज्यादा नंबर आयेंगे, उसे वे एक किताब ईनाम देंगे; और वो किताब मैंने ही जीती थी; XII के शुरुआत में ही उनका किसी अन्य स्थान पर चयन हो गया था, और वे PIC डोईवाला छोड़ कर चले गये थे; बाद में शायद 1979 या  80 में मेरे पिताजी के चाचा पिशोरी लाल जी के देहांत पर मैं और चाचा मदन लाल जी , चरण सिंह जी दिल्ली गये हुए थे, तो RAJAURI GARDEN में सब्जी  खरीदते वक़्त, अचानक उनसे मुलाकात हो गयी;
सत्यपाल जी के जाने के बाद कुछ दिन BK GUPTA (भूपेन्द्र कुमार) जी ने CHEMISTRY और Physics दोनों पढाई, फिर धर्मेन्द्र कुमार जी की नयी नियुक्ति हुई, उनका बताया, हमारे पल्ले नहीं पड़ता था; हमने काफी प्रयास किया कि, गुप्ता जी ही हमें PHYSICS CHEMISTRY दोनों पढ़ाते रहें; पर हमारी बात नहीं मानी गयी; फिर श्रवण अग्रवाल, मैं, सुखदेव और एक साथी और हम चारों गुप्ता जी के पास एक महिना PHYSICS की TUTION  पढ़े;
गुप्ता जी के पढ़ाने और समझाने का तरीका इतना व्यवहारिक था की CHEMISTRY एकदम से समझ में आ जाती थी; एक और विशेष बात यह थी कि, वे केवल BSs थे; और  Intermediate की कक्षाओं को पढ़ाते थे; वे नजीबाबाद के रहने वाले थे, शरीर से मोटे थे, कुछ साल बाद मुझे पता चला कि उनका देहांत हो गया; उनका चेहरा, अंदाज़ और अल्फाज़ वैसे ही मेरी आँखों में तैरते हैं;

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रविवार, 10 मार्च 2013

YAADEN (79) यादें (७९)

भानियावाला / डोईवाला प्रवास के दौरान केशरसिंह जी JOLLY-GRANT से मेरी काफी घनिष्ट मित्रता हो गई थी। वे उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं। जब मैं IX में दाखिल हुआ, उस समय तक वे INTERMEDIATE के बाद JBT (Junior Basic Teacher) व IGD BOMBAY (Inter Graduate Drawing ) के COURSE पूर्ण करके PIC में CHEMISTRY के LAB-ASSISTANT थे। फिर वे PIC में ही कक्षा VI से VIII के अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गए। कुछ समय बाद वे SGN KHALSA INTERMEDIATE COLLEGE देहरादून में चले गये। बाद में उनकी नियुक्ति डाक-तार विभाग में हो गयी। फिर वे अधिकतर GPO देहरादून में ही रहे। उत्तरांचल अलग होने पर वे POST MASTER GENERAL के कार्यालय में रहे। हम दोनों का एक दुसरे के पास काफी आना-जाना रहा। वे मेरे साथ एक बार नानुवाला भी आये।

इसी तरह बड़े मामा जी की दुकान के मालिक वैद्य रामस्वरूप जी भट्ट जिनकी रिहायश दुकान के ऊपर ही थी; वे मेरे पिताजी से काफी घुलमिल गए थे। उनका बड़ा लड़का श्रीकांत हरिद्वार पढता था। छोटा शशिकांत मुझसे एक या दो कक्षा आगे था। उससे छोटे रमाकांत-लक्ष्मीकांत (जुड़वाँ) कक्षा पाँच में मेरे सहपाठी थे। जब मैं नौवी में दुबारा गया तो उन दोनों से मुलाकात नहीं हुई। उन दोनों को आम तौर पर कोई नहीं पहचान सकता था; मगर हम सहपाठी पहचान लेते थे। उनकी छोटी बहन मेरी छोटी बहन सरोज की सहेली बन गयी थी।

वैद्य जी भी दो बार नानुवाला आये। एक बार मेरे वहां रहने के दौरान ही और दूसरी बार मेरी शादी में पिताजी ने विशेष रूप से वैद्यजी और डोईवाला के मशहूर पंडित रामानंद जी को नानुवाला बुलाया। छोटे मामा जी के साथ उनके दोस्त मामा सुरेश कुमार जी (घराट वाले ) भी आये थे। दीवाली के दुसरे दिन छोटे मामा जी रुक गए थे और मैं उनके साथ वापस रवाना हुआ। हम उनके घर पानीपत गए। उन्होंने वहाँ AMAR BHAWAN CHOWKजिसे तीन अलग-अलग दिशाओं से देखने पर हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी में अलग-अलग अमर भवन लिखा नज़र आता था। वहां हमने दिलीपकुमार, प्राण, वदीदा रहमान, मुमताज़ की मशहूर फिल्म राम और श्याम देखी। उनके साथ ही मैं पानीपत से डोईवाला आया।


आई हैं बहारें; देखो दूर हुए गम !

 प्यार का ज़माना आया;
मिटे ज़ुल्म-ओ-सितम !!
राम की लीला रंग लायी;
 श्याम ने बंसी बजायी।

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रविवार, 3 मार्च 2013

YAADEN (78) यादें (७८)


JOLLY-GRANT में हमने ऋषिकेश रोड से लगती हुई, 10 बीघा ज़मीन 6000 रुपये में खरीदी थी; उस समय उसमे गन्ना लगा हुआ था; अगली फसल धान बोई थी; बाद में हमने 8000 में बेच दी; यह लगभग वह स्थान है, जहाँ अब HIMALAYAN INSTITUTE OF MEDICAL SCIENCE  बना हुआ है;
 धान के SHELLER, तोरिया तेल निकलवाने EXPELLER पर या मक्की का आटा पिसवाने घराट पर अक्सर मैं जाता रहता था;एक बार सर्दियों के दिनों में सुबह मामा जी ने मुझे Jolly से ऊपर किसी गाँव में शायद धान या मक्की लेने किसी के घर भेजा, उनको भी मैं मामाजी ही कहता था; उन्होंने मुझे गरमा-गरम दाल-भात खाने को दी, मैं cycle पर गया था; हाथ इतने ठण्डे हो चुके थे कि, मुझसे खाया नहीं जा रहा था;  वापस आकर मैंने मामीजी को बताया तो उन्होंने कहा कि - उनसे कह देता कि मैंने हाथ सेकने हैं;
टिहरी बांध का कार्य आरम्भ हो चुका था; ऊपर पहाड़ से लोग अपने बैल लेकर नीचे आते थे; विस्थापन क्रिया का आरम्भ हो गया था; डोईवाला से भानियावाला के बीच सड़क के दोनों तरफ पुराली के ढेरों के साथ गढ़वाली अपने बैल लेकर आते-जाते रहते थे; मैं किशोर था, तो भी उनकी आँखों में मैंने बेघर होने के अहसास को महसूस किया था;  अभी दो-तीन साल पहले अख़बार में पढ़ा कि टिहरी-जलाशय को अब जाकर पूरा भरा गया है, कुछ लोग अभी भी घर छोड़ने को तैयार नहीं थे, टिहरी उजड़कर NEW TEHRI बस चुकी है;


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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

YAADEN (77) यादें (७७)

HIGH-SCHOOL के बाद मैं फिर भानियावाला बड़े मामाजी के पास रहने लगा था। मेरा परम-मित्र सतीश चन्द्र वैश्य अपनी मौसी के पास, लक्ष्मण विद्यालय इण्टर कॉलेज देहरादून में दाखिल हो गया था। हम दोनों ने AJANTA STUDIO चकराता रोड, देहरादून में इकट्ठी PHOTO खिंचवाई थी जो अभी भी मेरे पास है।
  
1971 की लड़ाई और बांग्लादेश के जन्म के साथ ही प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी का देश-विदेश में कद बढ़ा। इसके साथ ही भारत सरकार ने कुछ कड़े और ऐतिहासिक फैसले क्रियान्वित किये। भूतपूर्व राजा-महाराजाओं की पेंशन (PRIVY-PURSE) बंद करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, शारदा-कानून, सीमित बाराती आदि।
उसी दरम्यान राष्ट्रीय रंगमंच पर दो-तीन अप्रत्याशित सी घटनाएँ हुईं।

1- भारत के मुख्य न्यायधीश श्री अजीतनाथ राय पर गोली चली।
2- STATE BANK OF INDIA की कनाट-प्लेस शाखा, नई दिल्ली से 60,00,000/ - रुपये का दिन-दहाड़े गबन हुआ HEAD-CASHIER  ने बताया की उसे इंदिरागांधी का PHONE आया; जिसमें कहा गया था - "बेटा, मैं प्रधान-मंत्री रही हूँ। मेरा आदमी आ रहा है; बांग्लादेश शरणार्थियों के लिए साठ लाख रूपये दे देना।"
3- मुकदमा चलने से पहले ही,  HEAD-CASHIER की जेल में मौत हो गयी।
4- दिल्ली से अहमदाबाद जाने वाली रेलगाड़ी में RAILWAY-BOARD के अध्यक्ष (शायद अशोक गांगुली) की BOGIE भी लगी हुई थी, जिसे बीच के किसी स्टेशन पर काट कर अलग कर दिया।

मेरा किशोर-मन इन घटनाओं से काफी उद्वेलित हो गया था।
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रविवार, 17 फ़रवरी 2013

YAADEN (76) यादें (७६)

फ़ोटो: A view of Doiwala Railway station: http://apnybaat.blogspot.in/2013/02/yaaden-76.html
1971 की लड़ाई के वक़्त मैं दसवीं में था। चारों तरफ BLACK-OUT और लोगों में अथाह जोश। उस दरम्यान गुरूजी हसीन अहमद साहब में मैंने बला की स्फूर्ति देखी। मोटर-गाड़ियों की HEAD LIGHT काली-पट्टी पर  SILVER COLOUR में लिखा होता था -
 CRUSH-PAK
  हसीन साहब CLASS-ROOM में जितने सख्त-मिज़ाज थे, बाहर उतने ही सौम्य और नेक-दिल इंसान थे। उनका लड़का SHELLY छोटा ही था; उन्होंने बताया कि, अंग्रेजी कवि PERCY BISES SHELLY (PB SHELLY) के नाम पर रखा है। वे अंग्रेजी पढ़ाते थे; उनका समझाने का तरीका अच्छा था।  उन्होंने एक दिन कक्षा में मुझसे पूछा - अशोक FIRST DIVISION आएगी ? मैंने पूरे आत्म-विश्वास से कहा-YES SIR !
बुधवार को सफ़ेद DRESS पहनने की छूट थी, मैंने NARANG CLOTH STORE से सफ़ेद TERECOT की पेंट का कपडा 16 रुपये में लिया था; FOAM की SHIRTS का CRAZE था, मैंने 6 रुपये में हरी धारीदार कमीज़ का कपडा लिया था, PUNJAB TAILORS उस समय पेंट 3 रुपये, और SHIRT 1 रुपये में सिलते थे;  
HIGH SCHOOL 1972 की परीक्षा में हम चार विद्यार्थियों की FIRST DIVISION आई थी। किरणबाला जौहर, सुधीर कुमार शर्मा, सुभाष चन्द्र जायसवाल, और मैं। उस वक़्त माध्यमिक शिक्षा परिषद् उत्तर प्रदेश; इलाहाबाद का परीक्षा परिणाम लखनऊ से छपने वाले अंग्रेजी दैनिक NATIONAL HERALD में छपता था।
RESULT वक़्त मैं नानुवाला में था। वापस जाने पर पता चला की मेरे मित्रों ने RESULT सुनाने की ख़ुशी में छोटे मामाजी से 2/- रुपये ईनाम लिया था। 
काश सभी अध्यापक हसीन साहब जैसे हो पाते !!

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

YAADEN (75) यादें (७५)

1971 में नई-कांग्रेस (congress-R) गाय-बछड़े को लेकर चुनाव में उतरी तो संगठन-कांग्रेस (पुरानी-कांग्रेस) अपने पुराने चरखे के साथ थी। जनसंघ का जाना पहचाना नारा था-
 देश का दीपक ; प्रदेश का दीपक।
 एक खास और राज की बात ये कि, बड़े मामाजी ने दिल्ली से आये हुए जनसंघ के कार्य-कर्तायों के साथ; मुझे भी JOLLY  के POLLING-BOOTHS पर भेजा था। 
नयी-कांग्रेस ज़बरदस्त बहुमत से जीती; इंदिरा गाँधी लगातार गद्दी-नशीं रहीं। देवराज उर्स कांग्रेस अध्यक्ष बने। INDIRA IS INDIA का नारा प्रचलन में आया। 
इसी बीच पाकिस्तान में भी आम-इंतेखाब हुए , ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को शिकस्त देकर बंग-बंधू शेख मुजीब-उर-रहमान की आवामी लीग ने फ़तह हासिल की। इस शिकस्त से नागवार मशरिकी-पाकिस्तान के हुकुमरान ; शेख मुजीब को गद्दी सौंपने से इंकार हो गए। मगरीबी-पाकिस्तान में ज़बरदस्त इंक़लाब चला। पाकिस्तानी फौजों ने उन्हें दरिंदगी से मसलने की कोशिश की। लाखों लोग अपना वतन छोड़ कर भारत में शरणार्थी के रूप में आ गए। ज़बरदस्त बैनल-अक्वामी दबाव के बावजूद पाकिस्तानी सियासत-दां  अपनी जिद पर अड़े रहे।
भारतीय जनता तथा जनसंघ, और COMMUNIST समेत विपक्षी दलों ने प्रधान-मंत्री का पूरा साथ दिया। इंदिरा-गाँधी ने सभी मुल्कों का तूफ़ानी दौरा किया।
हसदे-मामूल USA पाकिस्तान की तरफदारी में ही था; USSR हिन्द का हिमायती था।
भारत-पाकिस्तान का 03.12.1971 से  ज़बरदस्त युद्ध आरम्भ  हुआ मशिरिकी-पाकिस्तान (BANGLA-DESH) की मुक्ति-वाहिनी पहली बार मगरबी-पाकिस्तान के खिलाफ लड़ी। बड़े मामाजी और मैं रातभर विविध-भारती पर गाने और ख़बरें सुनते थे। 

 पाकिस्तान की ज़बरदस्त शिकस्त के साथ भारत के LEUTINENT  GENERAL जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष पाकिस्तानी LEUTINENT GENERAL AAK NIAZI ने अपनी 90,000 फौजों समेत 16.12.1972 को ढाका में आत्म-समर्पण किया।

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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

YAADEN (74) यादें(७४)

तस्वीरनौवीं के बाद दसवीं में, मैं डोईवाला में छोटे मामाजी के पास रहने लगा था। ऋषिकेश रोड पर BUS-STAND के सामने उनकी किरयाने की दुकान थी। पूर्व में रामकुमार हलवाई, पश्चिम में घई जनरल स्टोर (रेणु के पिताजी),    उससे पश्चिम में RK RADIO, उसके साथ बक्शी (खुशीराम) मामाजी की रेडियो दुकान। उसी  में लगभग चौक के कुछ पहले सुरेन्द्र सिंह के पिताजी की सिलाई-मशीन की दुकान और फिर अमरजीत सिंह के पिताजी की रेडियो की दुकान। और चौक के दक्षिण पूर्व और PUNJAB TAILORS, और उससे दक्षिण को लगती हुई शाम सब्जी वाला और फिर डाक्टर हरद्वारी (FC SHARMA ), और (कृष्णलाल) BALI BAKERS.
 मामाजी की दुकान के बिलकुल सामने सड़क से उत्तर में उत्तराखंड बेकर्स (मंगतराम, अशोककुमार, और जीजा उनके  देवराज बाली) । देवराज जी का छोटा भाई घनश्याम भी कभी-कभी जम्मू से आता रहता था। bus-stand से तकरीबन 200 meter पूर्व में ऋषिकेश-रोड के उत्तर दिशा में सड़क से करीब 10-12 feet गहराई में सुदेश, प्रवेश मामाजी (पानीपत वाले ) का घराट था। उसके ठीक सामने दक्षिण को गुड के crasser  थे। और लगभग 1 km पूर्व में उत्तर-दक्षिण बहती सोंग नदी।
चौक से उत्तर-पश्चिम में आम के पेड़ के पास, मोहन पुस्तक भंडार (सतपाल जौहर),  फिर RAILWAY STATION की तरफ आगे विनोद जिंदल, और प्रमोद गुप्ता के पिताजी की दुकानें, उत्तर को मुड़ने पर पहले पाशो-पानवाला, फिर पंडित जी टिक्की, गुलाब-जामुन वाला, फिर पूरनचंद आत्माराम (रामनिवास)। चौक से दक्षिण पश्चिम में स्प्रिट का ठेका, फिर आगे सत्येन्द्र सिंगल की दुकान, NARANG CLOTH HOUSE, कमलराज के पिताजी की दुकान और सबसे आखिर RAILWAY-STATIOCANTEEN. 
इसी तरह MILL ROAD पर सुनील BOOK DEPOT, प्रदीप वासन, और प्रवीण वासन के परिवार की दुकानें थीं। देहरादून रोड पर प्रमोद व प्रवीण  थपलियाल के पिताजी डॉक्टर थपलियाल। आगे उत्तर को HARSH CINEMA से पहले,   PRINCIPAL साहब CL SHAH का निवास था। उनका लड़का भी PIC में ही हमसे आगे पढता था। उसी तरफ आगे उत्तर को, सड़क के पूर्व में पंडित दिलाराम का घर व मंदिर था। 
उन्ही दिनों इस अफवाह ने तेजी पकड़ी कि, पंडित दिलाराम पर साया आकर लोगों के कष्टों का निवारण करता है। एक दिन मैं भी अपनी बड़ी मौसी जी के साथ रात को कीर्तन में गया था; किन्तु मैंने अपने मन में इसे स्वीकार नहीं किया। उसके बाद मैं कभी नहीं गया।     


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रविवार, 27 जनवरी 2013

YAADEN (73) यादें (७३)

डोईवाला BLOCK में मुख्य-मंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी आये। हम लोग कार्य-क्रम में शामिल होने गए। भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के मुख्य-मंत्री के सामने बैठना सुखद और रोमांचकारी अनुभव था। वैसे भी किसी राजनीतिक हस्ती से मैं पहली बार रु-बरु हुआ था। पंडित जी की उस समय वाली, सौम्य छवि अभी भी मेरे मानस-पटल पर बसी है। उस समय तक उत्तर-प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की अगवाई में BKD (भारतीय क्रांति दल ) का जन्म हो चुका  था। 
 नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान प्रमुख हिंदी दैनिक थे; शायद 12 पैसे की अख़बार थी। रविवार को CHICK-YOUNG और BLONDY  के CARTOON धारावहिक छपते थे। नंदन, चम्पक चंदा-मामा, सरिता पत्रिकाएं थीं। अखबारों में फ़िल्मी विज्ञापन, विशेषतः शुक्रवार को भरमार रहती थी। शुक्रवार को ही फ़िल्मी साप्ताहिक अख़बार SCREEN  सबसे मंहगा 40 पैसे का आता था। हास्य-व्यंग की पत्रिका 'दीवाना' का जन्म भी हो चुका था।
 उस साल 1970 की HIT FILM राजेश खन्ना, शर्मीला टैगोर, मनमोहन कृष्ण, सुजीत कुमार की "आराधना" थी। इसके सभी गाने RADIO CEYLON, विविध-भारती और ALL INDIA RADIO की उर्दू-सर्विस पर गली मोहल्ले में सुने जाते थे। इसी से राजेश खन्ना को SUPER STAR के तौर पर पहचान मिली।
 दशहरे की छुट्टियो में जब मैंने घर आना था, तो सत्येन्द्र के पिताजी के निर्देशन में रामलीला चल रही थी ; उसमें मैंने मेघनाथ का PART किया था; लक्ष्मण मूर्छा के बाद रात को, डोईवाला से मैंने अम्बाला की रेलगाड़ी पकड़ी थी। दीवाली से पहले मामाजी के साथ दुकान की  साफ-सफाई शुरू की; तो मुझे लगा, दो-तीन दिन में काम निपट जायेगा; पर हम दोनों मामा-भांजा मजदूरों के साथ लगे रहे; रात 2-3 बजे तक रंग रोगन करके हमने दुबारा सामान जचा दिया था; उस दिन मैंने वक़्त, काम और आवश्यकता को महसूस किया;
 कक्षा IX  में किरणबाला जोहर, सुभाषचन्द्र जायसवाल , सुधीर कुमार शर्मा, सत्येन्द्र सिंगल, और मेरी टक्कर थी। मैंने कक्षा में प्रथम स्थान से उत्तीर्ण किया। 

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
Ashok 9414094991, Tehsildar ; Sri Vijay Nagar 335704 
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रविवार, 20 जनवरी 2013

YAADEN (72) यादें (७२)

बड़े मामा जी तो उसी पुराने आज़ाद मामा वाले मकान में रहते थे; और दुकान वैद्य रामस्वरूप जी भट्ट वाली थी, जिसके साथ पूर्व दिशा में रतनसिंह हलवाई, पश्चिम में राजू पानवाला, और सामने उत्तर में सड़क पार मदन बंगाली की दुकान थी। छोटे मामा जी सामने भगवान् सिंह जी के छोटे भाई ओमप्रकाश सैनी की दुकान से पूर्व दिशा में, मामचंद जी गुप्ता की दुकान में BAKERY करते थे। उनकी रिहायश चन्द्रप्रकाश जी गोयल के मकान में थी। 
जन्माष्टमी 1970 वाले दिन बड़े मामा जी के बड़े लड़के राजीव (BINTU)का मुंडन था; उसके कुछ दिन बाद, बड़े मामा जी नहर के पास मामचंद जी के घर से उत्तर दिशा में, अपने मकान में चले गए। 
मामचंद जी और चन्द्रप्रकाश जी का भांजा सतीशचन्द्र वैश्य, भी मेरा सहपाठी था। वह लखनऊ का रहने वाला था; और मेरी तरह ही अपने मामा मामचंद जी के पास रहता था।  बड़ा हंसमुख और विनोदी था। 
उनसे अपना नाम तिस्सा-भाई और मेरा सुक्खा-भाई रखा था। PIC (Public Inter College ) को वह Pen Ink Chor कहता था। 1973 के बाद हमारी मुलाकात नहीं हुई। वाराणसी में होटल मेनेजर था। शायद 1990 में आखिरी पत्र-व्यवहार हुआ। 2009 के बाद मैंने उसे कई बार ORKUT और FACEBOOK पर भी तलाश करने का प्रयास किया है। 
उसने मुकेश जी के प्रसिद्ध गीत - 
सावन का महिना  ..  ..    की parody बनायीं थी- 
छुट्टी का महिना,
 mummy जी करें शोर;
 सबको लागे ऐसे ,
 जैसे घर में घुस गए चोर।।  


जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 13 जनवरी 2013

YAADEN (71) यादें (७१)

नौवीं में शेरसिंह और  बाला दो ही भानियावाला से मेरे पांचवीं के सहपाठी थे। बाकि सुरेश कुमार करनवाल, विक्रमसिंह, प्रदीप वासन, प्रवीण वासन, प्रमोद थपलियाल, प्रवीण थपलियाल, सुधीर शर्मा, कमलराज अरोड़ा, प्रमोद गुप्ता, विनोद जिंदल, सत्येन्द्र सिंगल, सुभाष जयसवाल रमेश अग्रवाल, सतीशचन्द्र वैश्य, बलबीरसिंह, सुरेन्द्रसिंह, अमरजीत सिंह, मुमताज़ अली इस्हाक़ खान, किरणबाला जोहर, नीरू बाला जोहर, नीटारानी घई, रेनुबाला घई, के नाम और शक्लें मुझे याद हैं।
प्रमोद गुप्ता की केन्द्रीय भूमिका को लेकर हमने हसीन अहमद जी के निर्देशन में एक नाटक खेला था "यानि कि"  रतन सिंह जी सैनी के नेतृत्व में हम  YAMUNA HYDAL POWER STATION देखने ढकरानी और डाक-पत्थर गए थे, साथ  गोयल मैडम भी थीं ! देहरादून तक 41 UP MUSSOORIE ESPRESS में, और आगे बस करके, उसी साल  SCOUTGUIDE की टोली  लच्छीवाला के जंगल में CAMP-FIRE के लिए गयी। 
दिशायों के देवतायों ने बारी-बारी दौड़ कर आते हुए, अपना-अपना परिचय दिया ; और अपनी दिशा की अग्नि प्रज्वलित की। उसमें मैं उत्तर दिशा का देवता बना था। शायद हम रात को भी जंगल में ही तम्बुओं में रुके थे। कार्यक्रम में में देहरादून से DM साहिब भी पधारे थे। यद्यपि उस समय तक मैं प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अनुक्रम से परिचित नहीं था; तथापि District Magistrate पदनाम से ही मुझे उनकी गरिमा और शक्तियों का आभास हो गया था।


जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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