रविवार, 30 सितंबर 2012

YAADEN (56) यादें (५६)

छटी की पढाई शुरू होने पर पिताजी मेरे लिए पीतल का छोटा सा कमण्डल लाये ; माँ उसमे रोटी और पनीर  लपेट कर रखती; मैं उसे cycle के handle पर टांग कर ले जाता; सब लड़के उस डोलू को सराहते थे। शायद पूरे school लड़कों में से उस तरह का बर्तन सिर्फ मेरे पास ही था। अधिकांश लडके कपडे की पोटली में ही खाना लाते थे। 
आधी छुट्टी में नहर के किनारे बैठ कर खाने का स्वाद अविस्मरणीय है। कभी मन करता तो किसी पेड़ की टहनी पर चढ़ कर खाते थे। दूसरी खास चर्चा ये होती थी की; मेरे पास खट्टा-मीठा लस्सी का पनीर होता था,  दूध का फीका-फीका पनीर मुझे पसंद नहीं था।मेरे साथी दोस्त भी यदा-कदा चखते थे। 
 उस वक़्त तक PLASTIC के जूता-चप्पल का चलन नहीं हुआ था। गाँव में जब मेरे लिया नरम सुनहरी गुलाबी रंग के PLASTIC के SANDLE 6/- रुपये कीमत के आये तो; सबने सराहा था:-
रामजी के लडके के सैंडल 6 रुपये के !
रामजी गे छोरे गा सैंडल 6 रिपियाँ गा !
ਰਾਮਜੀ ਦੇ ਮੁੰਡੇ ਦੇ ਸੈਂਡਲ 6 ਰਾਪੈਯਾਂ ਦੇ !
 मैं बड़े चाव से पहनता था। उसके बाद उतने मुलायम और सुन्दर प्लास्टिक के जूते-चप्पल मैंने आज तक नहीं पहने। 


जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ  

Ashok, Tehsildar  Srivijaynagar  9414094991

रविवार, 23 सितंबर 2012

YAADEN (55) यादें (५५)

उस दौरान के दूसरे साथियों में 25NP के जसवंतसिंह, सुरजीतसिंह, अच्छर सिंह,  33NP के बूटासिंह, दलीपसिंह, अशोकसिंह, सतजंडा के हंसराज, राजाराम, बल्लेवाला के हंसराज, ठंडी के साहब राम, रामकिशन, 57NP ओमप्रकाश;  हमसे आगे वालों में 34NP नरेंद्र सिंह, 55NP सोहन लाल राहड़, पीछे वालों में गुरजंटसिंह, महेंद्रसिंह, श्यामसिंह, मोहनसिंह, जसवीरसिंह, सुल्तानराम, 57NP कृष्णचन्द्र के नाम याद हैं। 25NP के कश्मीरी ब्रह्मण परिवारों को 3 या 4 लड़कियाँ भी हमारे साथ 3 साल पढ़ीं।
ओमप्रकाश मेघवाल 57NP  कुछ साल पहले नानुवाला पंचायत का सरपंच था।  जसवंतसिंह POLICE में था, इसी महीने SEPTEMBER 2012 में रायसिंहनगर में देहांत हो गया। नरेंद्र VOLLY-BALL और कबड्डी का खिलाडी था। उससे भी अक्सर 2-4 साल बाद मुलाकात हो जाती है। रामकिशन मसानीवाला में रहता है; गुरजंटसिंह रायसिंहनगर में अध्यापक है, श्रीराम, गुरमेल, विश्वनाथ, और तेजासिंह का ज़िक्र पहले भी हो चुका है। विश्वनाथ 2002 में गुजर गया। तेजासिंह संधू  श्रीगंगा नगर में ADVOCATE है। गुरमेल सरदारपुरा बीका (खिचियाँ) में रहता है।

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ  
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रविवार, 16 सितंबर 2012

YAADEN (54) यादें (५४)


उस समय 25NP, शामगढ़, और रायसिंहनगर में ही MIDDLE SCHOOL थे। हिंदी में माध्यमिक बोला जाता था; लगभग उसी दरम्यान उनका नामकरण उच्च प्राथमिक हुआ।
 नानुवाला, बल्लेवाला, 45NP 55NP 56NP 57NP 35NP सतजंडा,  34NP, 33NP ठंडी, मोहन नगर, 20NP 22NP वाले 25NP ही पढ़ने जाते थे।
छठी में मेरे अलावा नरेंद्र कुमार बिश्नोई 20NP, प्रेम कुमार मंडा 35NP, कृष्ण कुमार मंडा सतजंडा, प्रह्लाद राय 56NP,  पढ़ाई  में होशियार थे
नरेन्द्र कक्षा का MONITER था। एक दिन वह गणित के सवाल करवा रहा था, मैंने SLATE पर सवाल हल करके उसे दिखाया, तो उसने काटा X दिया। मैंने अपनी टाट-पट्टी पर बैठ कर दोबारा जाँच किया, तो मेरे सवाल सही था। मैंने एकदम से जाकर उसका गला पकड़ लिया। वह रोता हुआ HEADMASTER जी के पास गया; पीछे-पीछे मैं भी चला गया। उस दिन से उसने MONITERY छोड़ दी।    उसके पिता पृथ्वी राज सरपंच थे। उसका बड़ा भाई गजेन्द्र हमसे एक CLASS आगे था। बाद में तीन साल  हम दोनों दोस्त बन कर रहे 
25NP का साथ छूटने के कुछ साल बाद साँप काटने से प्रह्लाद की मौत हो गई, पता चला कि नरेंद्र भी छोटी उम्र में गुज़र गया। प्रेम ENGINEERING  में बीकानेर चला गया था, उससे पाँच-चार साल बाद मुलाकात होती रही है; कृष्ण कुमार महाराष्ट्र में KL BISHNOI के नाम से IPS है। उससे आज तक मुलाकात नहीं हुई। 

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ  
Ashok, Tehsildar  Srivijaynagar  9414094991


रविवार, 9 सितंबर 2012

YAADEN (53) यादें (५३)


रतनाराम जी, सफ़ेद कमीज़-पायजामा पहनते थे, और सरल स्वाभाव के थे। उनकी एक आँख नहीं थी। अजमेर सिंह जी नए लगकर पहली बार आये थे; वे सुरुचिपूर्ण FASHIONABLE थे। पेंट के ऊपर पूरे बटनों वाली गोलाई-CUT की कमीज़ का रिवाज़ था। वे सामान्य-विज्ञान पढ़ाते थे। 7वीं की अर्धवार्षिक परीक्षा में मेरे 69/70 NUMBER आये थे। वे पदमपुर के आस-पास रहने वाले थे; 1990 के आस-पास एक-दो बार उनसे मुलाकात भी हो गई थी।
 पदम कुमार जी शर्मा के ज़िक्र के बिना मेरा विद्यार्थी जीवन अधूरा है। वे गजसिंहपुर से आये थे; फिरोजपुर के रहने वाले थे। TERELENE की काली चमकीली पेंट ऊपर वैसी ही चकाचक सफ़ेद बुश-शर्ट, मुंह पर हल्के चेचक के दाग; सुरुचिपूर्ण कंघी किये बाल, और स्नेहयुक्त हल्की मुस्कान लिए मधुर वाणी। संस्कृत और ENGLISH दोनों भाषाओं पर उनका पूरा अधिकार था। वे अक्सर दुलारामजी के साथ नानुवाला आ जाते थे; इस तरह हमारे घर भी उनका आना हो जाता था। मई 1970 में, मैं 8वीं PASS कर चुका था; पदमकुमार जी नानुवाला दुलाराम जी के घर (मेरे ननिहाल)  लेटे-लेटे ख़बरें सुन रहे थे, मैं उनके पाँव दबा रहा था, जैसे LOTIKA RATNAM ने बोला- "AND THAT  IS END OF THE  NEWS" वे RADIO बंद करते हुए पंजाबी में बोले-
बेटा तेरा राज के खजाने में शीर है। ਬੇਟਾ, ਤੇਰਾ ਰਾਜ ਦੇ ਖ਼ਜ਼ਾਨੇ ਵਿਚ ਸ਼ੀਰ ਹੈ। 
मैंने कहा-
गुरूजी मैंने नौकरी नहीं करनी। ਗੁਰੁਜੀ ਮੈਂ ਨੌਕਰੀ ਨਹੀਂ ਕਰਨੀ।
 वे बोले-
नहीं बेटा मैं तो तुझे बता रहा हूँ। ਨਹੀਂ ਬੇਟਾ, ਮੈਂ ਤਾਂ ਤੌਨੁ ਦਾਸਿਯਾ ਹੈ।
उसके बाद मैं देहरादून चला गया था। उनकी बात सही निकली मैं नौकरियां छोड़ता रहा, और नौकरियां मेरे पीछे-पीछे भागती रहीं। 2008-09 में जब मैं नागौर था, एक दिन BUS पदमपुर पहुँचने पर मैंने देखा, वे सामने खड़े थे; मैं आश्चर्य मिश्रित उत्साह में जल्दी से उतर कर भागा। उनको चरण-स्पर्श किया; वे भी गदगद हो गए; मुश्किल से दो या तीन MINUIT की ये मुलाकात थी। 
 
जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 2 सितंबर 2012

YAADEN (52) यादें (५२)

जुलाई 1967 में SCHOOL खुलने के थोड़े दिन बाद, महेंद्र सिंह जी का तबादला हो गया। जिन लड़कों के पास CYCLE थी, वे उनका सामान पहुँचाने मोहन नगर RAILWAY स्टेशन गये थे। गर्मी की दोपहर और रेतीला रास्ता; घर देर से  पहुंचने के कारण, मेरे माँ-पिताजी चिंतित थे। काशीराम जी गणित पढ़ाते थे; वे काफी सख्त स्वाभाव के थे;  पर जिस दिन उनका तबादला हुआ, विदाई पार्टी में वे भावुक हो गये थे, तब मैंने उनकी कोमलता महसूस की थी। उन्होंने विद्यालय के लिए सहयोग भी दिया था।
सोहन लाल जी हिंदी पढ़ाते थे, उनकी हमारे गाँव में मनीराम गोदारा के साथ रिश्तेदारी भी थी; 33NP में उन्होंने कपास बीज रखी थी। जो लड़के 33NP के रास्ते पैदल जाते थे; उनको कपास चुगाई का काम मिला। दूसरे साथियों ने मुझे कहा; तो मैंने मना कर दिया। छटी की छमाही परीक्षा में मेरे 20/70 अंक आये। मैंने हंगामा खड़ा कर दिया। संयोगवश बाशी चाचा जी (सुभाषचन्द्र शर्मा) सोहनलाल जी के परिचित थे। उनको पता चला, तो उन्होंने मुझे समझा-बुझा कर शांत किया।
जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 26 अगस्त 2012

YAADEN (51) ​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​यादें (५१)

​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​राजकीय उच्च प्राथमिक  पाठशाला 25 NP में दुलाराम जी यादव प्रधानाध्यापक थे। महेंद्र सिंह जी; सोहनलाल जी; काशीराम जी; अवतार सिंह मान; अजमेरसिंह जी ; हरमेलसिंह जी; रतना राम जी  अध्यापक थे; दुलाराम जी नानुवालामें रहने के इच्छुक थे। मेरे ननिहाल का मकान खाली था; पिताजी ने उनको मकान दे दिया।
 इस नाते मैं उनको मामाजी कहने लगा था;मेरे देहरादून जाने के बाद वे रायसिंह नगर, शामगढ़ फिर रावला गाँव, और बाद में हनुमानगढ़ चले गये थे;  ये सिलसिला लगातार उनकी मौत तक जारी रहा; अभी भी उनके परिवार का हमारे साथ वैसा ही सम्बन्ध है।
 अवतार सिंह जी के पिता चड़त सिंह जी की स्कूल स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके एक भाई हरवंत सिंह उस समय संगरिया में HEADMASTER थे; जो बाद में  RTS बन गए थे; अवतार सिंह जी हनुमानगढ़ जंकशन भगत सिंह चौक में मान ELECTRICALS और RAJASTHAN ELECTICS के नाम से दुकान करते हैं। उनका मुझ पर अब भी वैसा ही स्नेह है।     
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जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 19 अगस्त 2012

YAADEN (50) यादें(५०)

और इस तरह एक साल तक मैं, अलग तरह की दुनिया में रहने के बाद JUNE 1967 में वापस नानुवाला आ गया।  आते वक़्त भी बड़े मामाजी साथ थे; सहारनपुर तक बस, आगे अम्बाला, बठिंडा तक रेल , वहां से हिन्दुमलकोट की TRAIN पकड़ कर अबोहर, वहां से गंगानगर बस और फिर रायसिंहनगर पिताजी को मिलते ही मैं रोने लगा था। 

लौटने के बाद, मेरा और विश्वनाथ का एक साथ 25 NP में छटी कक्षा में दाखिला हुआ था। पिताजी मैं, विश्वनाथ और उसकी माता, जिनको मैं आज भी सीता मामी ही कहता हूँ ; हम चारों नानुवाला कोठी होकर नहर- नहर गए थे।  पिताजी मुझे 20" CYCLE दिलाना चाहते थे मैं न तो 20" और न ही 22" पर राज़ी था;  मैंने 24" की बड़ी साइकिल के लिए ही जिद की। चाचा ओम प्रकाश जी मेरे लिए ATLAS CYCLE 140/- में लेकर आये थे। फिर उसकी गद्दी नीची करके FITTING करवाई।

स्कूल जाते हुए हम हवा भरने के PUMP, PUNCTURE,    SOLUTION , WRENCH, BLADE  आदि ज़रूरत का सामान साथ रखते थे। यदा-कदा पटरी से साइकिल समेत नहर में भी कोई गिर जाता था। पैदल जाने वाले नहर वाले रास्ते के अलावा, नानुवाला से सीधे 33 NP होकर 25 NP के पुल पर पहुँच जाते थे। नानुवाला गाँव RD 4.500 पर है; नानुवाला कोठी  SAMEJA DISRTRIBUTERY की TAIL 68.500 RD पर है; और 25NP का पुल 55 RD पर है। इस तरह गाँव से हमारा SCHOOL 18 बुर्जी यानि 18000 FEET है।

 जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 12 अगस्त 2012

YAADEN 49 यादें(४९)

उन दिनों भनियावाला डोईवाला के आस-पास बालयोगेश्वर का काफी प्रचार था। जगह-जगह पर नारे लिखे थे- "सतयुग आएगा"; हमारे घर के सामने सड़क से उत्तर को मास्टर भगवान सिंह जी के घर के सामने वाले बरामदे में एक दुबले-पतले भगवाधारी बाबा जी मुंह में लोहे का आर-पार खोखला तिकोन लगाकर प्रचार करते रहते थे। उनकी शक्ल-ओ-सूरत मुझे वैसे ही नज़र आती है। उनका कोई अनुयायी मुझे नहीं लगा था। इन बालयोगेश्वर ने बाद में 14 वर्ष की आयु में, अपने से काफी बड़ी एक AMERICAN धनाढ्या से विवाह कर लिया था। 

 गुरु-पर्व पर जुलुस में, माता के मन्दिर; और ऋषिकेश ROAD BUS -स्टैंड  ऋषिकेश ROAD पर महंत जी के डेरे वाले भंडारे में भी मैं डोईवाला गया था। वैसे बड़ी मौसीजी के पास यदा-कदा चला जाता था। गौरीश्याम और इंद्रजीत के साथ मेरी अच्छी पटती थी। चौक बाज़ार में उस वक़्त जवाहर पुस्तक भंडार मशहूर था, वहां से खरीदना शान समझी जाती थी।

 देहरादून झंडेवाले मेले में भी हम गए थे। रानीपोखरी में दादा गुरदित्तामॉल का hotel था; और jolly-grant में दादा दुर्गादास जी परचून की दुकान करते थे। मैं उनके पास भी गया था।  1966 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार क्षेत्र से CONGRESS के सामने निर्दलीय प्रत्याशी नित्यानंद स्वामी थे; भानियावाला में नहर के पास उत्तर दिशा में महन्तों का जो घर है; वे उनके करीबी रिश्तेदार थे। उनका निशान शेर था।वे विजयी रहे थे। बाद में मैंने सुना कि वे congrass में शामिल हो गए।वे उत्तराखंड के मुख्य-मंत्री भी बने। 
तब तक कांग्रेस का नारा-
भारत वालो  आ नहीं जाना,  किसी के  तोड़े-मोड़े पर
सोच समझ कर; मोहर लगाना; दो बैलों के जोड़े पर।।
जनसंघ का नारा था-
देश का दीपक। प्रदेश का दीपक।।

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 5 अगस्त 2012

YAADEN 48 यादें(४८)

भानियावाला में उत्तर से दक्षिण नहर जाती थी; उसमे दक्षिण पश्चिम दिशा में नूनावाला नामक गाँव, का जब जिक्र होता तो मुझे लगता कि सब लोग गलत उच्चारण कर रहे है; नानुवाला बोलना चाहिए। इसी तरह से आगे उत्तर-पूर्व को  भोगपुर था; मुझे लगता की इसका सही नाम भोमपुरा {रायसिंहनगर-अनूपगढ़ मार्ग का एक गाँव} होना चाहिए। 
देहरादून से आने वाली UP ROADWAYS की सभी बसें ऋषिकेश तक तो जाती ही थीं; कुछ आगे नरेन्द्रनगर, पौड़ी, या LENSDOWN  भी जाती थीं। एक रानीपोखरी से ऊपर भोगपुर और एक JOLLY-GRANT से ऊपर उत्तर पूर्व को थानों भी जाती थी। सुबह 9 बजे के लगभग HIMACHAL परिवहन नाहन की बस शिमला से हरिद्वार और शाम को लगभग 5 बजे वापस जाती थी। 
भानियावाला-छिद्दरवाला -हरिद्वार सड़क उस समय नहीं थी। छिद्दरवाला हमारे SCHOOL के आगे से कच्चा रास्ता थ। हरिद्वार के लिए डोईवाला से रेलगाड़ियाँ थीं, या फिर ऋषिकेश होकर ही जाना पड़ता था;  बरसात , में टीन की चादरों के नीचे लगे हुए परनालों  से पीने का पानी भरते थे।  काले रंग की AMBASSADOR TAXI का प्रचलन वहां मैंने पहली बार देखा था।
अक्सर देहरादून की तरफ से मुर्दे लदी गाड़ियाँ भी आती थीं, जिनके परिजन ऋषिकेश जाकर दाह-संस्कार करते थे।
 ये सब कुछ मेरे लिए नया अनुभव था। 
जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 29 जुलाई 2012

YAADEN 47 यादें (४७)

राजस्थान में हम हिंदी अंग्रेजी, गणित, सामान्य-विज्ञान, सामाजिक-ज्ञान, चित्र-कला और उद्योग पढ़ते, सीखते थे। उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) में भाषा, हिसाब, कृषि एवं विज्ञान, के साथ ही भूगोल के मानचित्र भी बनाने पड़ते थे। सबसे खास बात ये थी, की कृषि यंत्रों की व्यावहारिक जानकारी तथा गोबर की खाद, हरी खाद व् शौचालयों बाबत बातें। बाल सभा में अन्ताक्षरी मुख्य होती थी।
विद्यालय के दक्षिण-पश्चिम तरफ गूलर का बड़ा सा पेड़ और उसके बड़े-बड़े लाल फूल मेरे लिए नई चीज़ थे।
शेरसिंह के अलावा  भगवान सिंह , मोहनसिंह, भक्तराज, जगदीश सिंह, जीत सिंह, अजीत सिंह, बाला, मेरे साथ पांचवीं में थे. जगदीश सिंह, सरदार होने के कारण मैं कई बार उससे पंजाबी में बात करने का प्रयास करता था; किन्तु उसने कभी पंजाबी नहीं बोली। उसके चाचा जूते बनाते थे, और बड़े मामाजी के साथ पंजाबी में ही बात करते थे। जगदीश, मोहन सिंह तथा भक्तराज की लिखाई बहुत सुन्दर थी, कक्षा के बाकी  सब की लिखी भी मुझसे तो अच्छी ही थी, वहां पर छोटी कलम, बड़ी कलम से लिखा जाता था। राजस्थान में HOLDER से लिखते थे।
मोहन सिंह, भगवान सिंह, शेरसिंह और बाला  नौवीं में फिर मेरे साथ हो गए थे; बाकी साथियों से फिर मुलाकात नहीं हुई .  
   जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 
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रविवार, 22 जुलाई 2012

YAADEN(46) यादें (४६)

जून 1966 में  मामा जी भानियावाला से आये, और मुझे अपने साथ ले गए; देहरादून-ऋषिकेश ROAD पर देहरादून से 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से 20 किलोमीटर; मुख्य सड़क से दक्षिण में उत्तर को खुलता हुआ मकान था; उसके मालिक आजाद मामाजी थे; पूर्व दिशा में चौधरी कलमसिंह जी का मकान था; उनका बड़ा बेटा पदमसिंह, छोटे मामाजी का दोस्त था; मझला सतपाल सिंह, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में पढ़ता था; और छोटा शेरसिंह मेरा सहपाठी था; BESIC PRIMARY SCHOOL भानियावाला में उस वक़्त रमेशचँद जी रतूड़ी प्रधानाध्यापक 5 वीं को, और पूरणसिंह जी कक्षा 4 को पढ़ाते थे; अन्य गुरुजन का मुझे याद नहीं है;
उस वक़्त उत्तर प्रदेश में 52 जिले थे; राजस्थान में हम तख्ती पर गाचनी से सफ़ेद पोच कर काली स्याही से लिखते थे; वहां जाने पर तवे की कालिख से पोच कर; धूप में सुखाकर, खाली काँच की बोतल से घोटते थे; बाकायदा आपस में जिदाई होती थी कि, किसकी तख्ती ज्यादा चमकती है ?  चूने में भिगो कर सफ़ेद लिखते थे; एक और नई चीज ये थी, कि वहां उलटी गिनती 100 से 1 तक बोलनी पड़ती थी; गुरु जी ने एक दिन उलटी गिनती सुनाने के लिए मुझे उठाया ; तो मैंने हाँ तो भर ही ली ; फिर धीरे-धीरे हिम्मत करके करके पूरी तो भी कर ही  दी   
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 15 जुलाई 2012

YAADEN (45) यादें (४५)

मेरे 4थी पास करने से ठीक पहले एक ज़बरदस्त और अप्रत्याशित घटना हुई; जीवन सिंह जी का लड़का, महेंद्र सिंह जो मुझ से एक कक्षा नीचे था; एक रंगीन PLASTIC कांच का फुटा SCALE लेकर SCHOOL में आया; उसके उस फुटे को सबने बड़े चाव से देखा परखा और सराहा;
वह फुट जब मेरे हाथ में आया लगभग उसी समय HALL में ततैया आ गए ; सब बच्चे अपने-अपने तरीक़े से उन्हें मारकर भगाने लगे; मैं भी, इस काम में शामिल हो गया; और मेरे हाथ से वह सुन्दर फुटा टूट गया 
बात का बतंगड़ बन गया; दुश्मनी के हालात तो पहले से ही चले आ रहे थे;  उस रात आमने-सामने लाठी-भाटा जंग के पूरे आसार हो गए थे;
दूसरे दिन पिताजी रायसिंहनगर से 4 नए रंग-बिरंगे फुटे लाए ; 2 मैंने महेंदर को दिए और दो अपने लिए रखे;
यह घटना मेरे भानियावाला जाने का मुख्य कारण  थी;

गुरमेल ने एक चुटीली कहावत बनाई -

हाय, नी ! मुड़ की होया ? ਹਾਏ, ਨੀਂ ! ਮੁੜ ਕੀ ਹੋਇਯਾ ?
फुट्टा मर गिया !             ਫੁੱਟਾ ਮਰ ਗਿਆ !               

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ  
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रविवार, 8 जुलाई 2012

YAADEN (44) यादें (४४)

कुछ तो आपसी रंजिश कुछ रोजगार की वज़ह से मामा केदारनाथ जी की मौत के बाद मेरे ननिहाल का परिवार अपनी ज़मीं ठेके पर देकर पूरी तरह भानियावाला चले गए. उनके कुछ समय बाद,शायद मई 66 में दादा दुर्गादास जी व गुरदित्तामल भी चले गए. इनके मकान की देखभाल का जिम्मा पिताजी पर आ गया था. 
दुर्गादास जी ने JOLLY GRANT में दुकान की और गुरदित्तामल जी ने रानीपोखरी में होटल खोला; बाद में वे दोनों परिवार जम्मू चले गए; दुर्गादास मंगतराम जी बक्शीनगर रौलकी अपने रिश्तेदारों के पास और गुरदित्तामल जी जम्मू के पास ही राजबाग चले गए.
कुछ साल बाद गुरदित्तामल जी दिल्ली अपने चचेरे भाई बृजलाल सेठी के पास सुभाष नगर चले गए;वहाँ से लगभग 1976में रायसिंहनगर वापस आकर उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक के सामने होटल खोला; कुछ दिन मैंने भी उनके साथ काम किया था; फिर भाग-दौड़ करके अन्त्योदय परिवार के तहत अमरपुरा बारानी  में 9 बीघा अराजी काश्त के लिए ज़मीं ALOT हो गई  थी;   मुफलिसी के हालात में ही उनका इन्तेकाल हो गया. कुछ साल बाद उनकी पत्नी और दत्तक  पुत्र जगदीश, जो 24 PS में अपने माँ-बाप के पास वापस चला गया था; उसकी भी मौत हो गई. 
मंगत राम जी के साथ मेरे पिताजी की चचेरी बहिन सत्या  देवी का विवाह 1971 में हुआ. उनका लड़का विनोद कुमार है. 
 जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
  Ashok, Tehsildar Hanumangarh ;
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रविवार, 1 जुलाई 2012

YAADEN (43) यादें (४३)

उस समय नहर पार शामलाल की चक्की थी उसका लड़का मोहनी था वे नायक थे; पर बहुत बढ़िया पंजाबी बोलते थे; शामलाल जी बहुत अच्छे सलीके से बात करते थे; मैं उनका बहुत सम्मान करता था; बाद में हमारे स्कूल से बिल्कुल पश्चिम में गणेशाराम सुथार ने चक्की और आरा मशीन लगाई उनका बड़ा लड़का नंदराम और अर्जुन बावरी का बड़ा भाई काम करते थे; वो गूंगा-बहरा था; हम सब बच्चे स्कूल आते-जाते उससे डरते थे; मेरी लिखाई साफ़ नहीं थी; मेरा लिखा पत्र न पढ़ पाने के कारण बड़े मामाजी ने मुझे डांटा भी था;
 नंदराम का छोटा भाई मनीराम मुझसे दो जमात आगे सुरेशलाल का सहपाठी था; छोटा काशीराम मुझसे एक दर्जा नीचे था; बाद में वो अपने किसी रिश्तेदार के गोद चला गया था; काशीराम से 1966 के बाद मुलाकात नहीं हुई;
मनीराम आजकल रायसिंहनगर पटवारी है; और सुरेशलाल शर्मा  हनुमान गढ़ जंकशन में प्रख्यात ज्योतिषविद हैं; उनका और मेरा चाचा-भतीजा वाला रिश्ता बरक़रार है; दादीजी श्रीमती कुंती देवी का 28.05.2012 सोमवार को यहाँ उनके पास ही इन्तेकाल हो गया है;


जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 24 जून 2012

YAADEN (42) यादें (४२)

1965-66 में मैं, तेजा, गुरमेल, श्रीराम, विश्वनाथ चौथी में थे; उस वक़्त सुल्तान सुथार, किरण, पद्मा, धनीराम लाम्बा की लड़की राजकुमारी, मेरी बुआ सत्या देवी, कृष्ण मंडा का छोटा भाई बुधराम तीसरी में थे; सुल्तान राम की लिखाई सुन्दर थी;
पंडित रघुनाथदास की बड़ी लड़की चमेली दिल्ली में ब्याही थी, छोटी कौशल्या (छल्लो) व सेवक राम तुली की शादी एक ही दिन थी; दिल्ली से बारात आई थी, तीन दिन बारात रुकी, गर्मियों के दिन थे नहर बंद थी; पानी की बहुत किल्लत थी; बारात विदा हो रही थी जब नहर में पानी आया;
ठाकुर संतराम जी की छोटी बेटी कांता की शादी ठाकुर ज्ञानचंद के बेटे रामसिंह के साथ हुई;
 उसी दिन तीसरी में पढने वाली राजकुमारी की शादी भी हुई; हमीरा जी के पोते, लूणा जी मंडा  के बेटे बुधराम की शादी भी उसी दरम्यान हुई थी; अपने से एक दर्जा नीचे पढने वाले इन दोनों की शादियों से मैं काफी हैरान, परेशान था;
उस साल आस-पास के गावों के विद्यार्थी सालाना इम्तिहान देनें हमारे गाँव आये थे; सबने अपने-अपने घर एक-एक साथी को रखा था; शामगढ़ का एक लड़का मेरे साथ हमारे घर रुका था; उन पाँच-चार दिनों में हम दोनों पूरी तरह घुल-मिल गए थे; उसके बाद आज 46 साल बीतने पर भी हम दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी है;
चौथी पास करके जून1966 में मैं अपने बड़े मामा वेदप्रकाश जी के साथ पांचवी पढने के लिए, भानियावाला चला गया था ! 

 जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
 Ashok, Tehsildar Hanumamgarh 9414094991  

रविवार, 17 जून 2012

YAADEN (41) यादें (४१)

1965 की लड़ाई में भारतीय जवानों ने अपने सीने पर बमगोले बांध कर AMERICAN PATERON TANKs के परखचे उड़ा दिए, पाकिस्तान की शिकस्त, AMERICA की किरकरी, विश्व कूटनीति में GENERAL याहिया खान ,अयूब खान और जुल्फिकार अली भुट्टो की गिरावट के साथ ही हमारे यहाँ पंजाबी का गीत मशहूर हुआ-

अयूब खां ते भुट्टो ने की नफा कमा लेया ; गिद्दडाँ ने जंग शेरां नाळ ला लेया

ਅਯੂਬ ਖਾਂ ਤੇ ਭੁੱਟੋ ਨੇ ਕੀ ਨਫ਼ਾ ਕਮਾ ਲੇਯਾ; ਗਿਦੜਾ ਨੇ ਜੰਗ ਸ਼ੇਰਾਂ ਨਾਲ ਲਾ ਲੇਯਾ

ताशकंद समझोता, प्रधान-मंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत, गुलजारीलाल नंदा दुबारा कार्यवाहक प्रधान-मंत्री और फिर इंदिरागांधी का प्रधान-मंत्री बनना बहुत तीव्र घटना क्रम चला;
सुभाष चन्द्र बोस के बाद शास्त्री जी की दूसरी मौत है, जिसमे शक की सुइयां आज तक घूम रही हैं; 
इसके तुरंत बाद संत फतेहसिंह ने पंजाबी-सूबा आन्दोलन चलाया; जिससे हरयाणा और हिमाचल प्रदेश का जन्म हुआ; उस समय मैं चौथी में पढता था; चंडीगढ़ का मसला काफी चर्चा में थे; मैंने भी छः नए पैसे के POST-CARD पर अपनी सलाह लिखकर- इंदिरागांधी, प्रधान मंत्री दिल्ली के पते पर भेजी थी कि;

चंडीगढ़ किसी भी राज्य को न दिया जावे;

किसी राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दे पर मेरे बाल -मन की यह प्रथम सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी;     

Ashok, Tehsildar Hanumamgarh 9414094991
जय
हिंद
جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 10 जून 2012

YAADEN (40) यादें (४०)


RADIO के साथ तार जोड़कर ऊपर छत पर या ऊँची जगह पर जालीदार एंटेना बांधा जाता था. रेडियो की BATTERY भी रेडियो से अलग लगभग 
12"x8"x4 " माप की होती थी लाल काले रंग पर 9 के बीच से बिल्ली छलांग लगाती हुई होती थी बाद में छोटे माप की और फिर radio के अन्दर ही fit होने वाली आने लगी रेडियो का सालाना
LICENCE र 7.5 डाकघर में जमा होते थे; जमा न कराने पर बाकायदा जुरमाना लगता था. डाक-तार विभाग एक ही थे बाद में दोनों अलग हुए और फिर प्रसार भारती और BSNL के रूप में सार्वजनिक उपक्रमों का गठन हुआ निकिल के एंटेना वाले TRANSISTER आने के बाद उस तरह के रेडियो लुप्त PRAY हो गए. 
रायसिंह नगर से चाचा नारायण सिंह अपना
TRANSISTER लेकर जब भी आते; हमारे घर ही रुकते थे, हालाँकि उनके भाई ध्यान सिंह और प्रीतम सिंह आने पर अपने राजपूत रिश्तेदारों के घर ही रुकते थे; उन दिनों चाचा  चरण सिंह और कृष्ण बिश्नोई  सरदार अजायब सिंह के ट्रेक्टर पर काम करता था; कृष्ण शुद्ध पंजाबी बोलता था .
गाँव में एक MASSEY FURGUSSION और एक FORDSON 2 ही TRACTOR थे; तेजा के पिता मल्कियत सिंह संधू के पास JEEP थी जिसके ACCIDENT में उनकी मृत्यु हो गयी थी;
 उस ज़माने में मशहूर पंजाबी गायकों में सुरेंदर कौर, प्रकाश कौर, आसासिंह मस्ताना, लालचंद यमला जट, बाबु सिंह मान माराड़ावाला, रम्पटा थे. 
बत्ती बाल के बनेरे उत्ते रखदी हाँ:
ਬੱਤੀ ਬਲ ਕੇ ਬਨੇਰੇ ਉੱਤੇ ਰਖਦੀ ਹਾਂ
कता परीतां नाल चरखा चनण दा:
ਕਤਾਂ ਪਰੀਤਾਂ ਨਾਲ ਚਰਖਾ ਚੰਨਣ ਦਾ
जुत्ती कसूरी पैर न पूरी ,हाय रब्बा वे सानु तुरना पया:
ਜੁੱਤੀ ਕਸੂਰੀ, ਪੈਰ ਨ ਪੂਰੀ ਹਾਯ ਰੱਬਾ ਵੇ ਸਾਨੂੰ ਤੁਰਨਾ ਪਾਯਾ
आवो लोको नस के मेरा जीजा वेखो हस के:
ਆਵੋ ਲੋਕੋ  ਨਾਸ ਕੇ ਮੇਰਾ ਜੀਜਾ ਵੇਖੋ ਹਾਸ ਕੇ
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग मईया: 
ਲਠੇ ਦੀ ਚਾਦਰ ਉੱਤੇ ਸਲੇਟੀ ਉੱਤੇ ਸਲੇਟੀ ਰੰਗ ਮਹਿਯਾ
जग देया चनणा तू मुख ना लुका वे:
 ਜਗ ਦੇਯਾ ਚੰਨਣਾ ਤੂੰ ਮੁਖ ਨਾ ਲੁਕਾ ਵੇ
RAMPTA जा वडेआ लुधियाने
ਰੰਪਟਾ ਜਾ ਵਡੇਆ ਲੁਧਿਆਣਾ  
काला डोरिया कुंडे नल अडया, छोटा देवरा भाबी नाल लडेया
ਕਾਲਾ ਡੋਰਿਯਾ ਕੂੰਡੇ ਨਾਲ ਅੜੇਆ, ਛੋਟਾ ਦੇਵਰਾ ਭਾਬੀ ਨਾਲ ਲੜੇਆ   
तड़के-तड़के जान्दिये मुटियारे नी, कंडा चुबा तेरे पैर बंकिये नारे नी
ਤੜਕੇ- ਤੜਕੇ ਜਾਂਦੀਏ ਮੁਟਿਆਰੇ ਨੀ, ਕੰਡਾ ਚੁਬਾ ਤੇਰੇ ਪੈਰ ਬੰਕਿਏ ਨਾਰੇ ਨੀ  
भांवे बोल ते भांवे ना बोल, चन्ना वस् अखियाँ दे कोल
ਭਾਂਵੇ ਬੋਲ ਤੇ ਭਾਂਵੇ ਨਾ ਬੋਲ, ਵੇ ਚੰਨਾ ਵਸ ਅਖਿਯਾਂ ਦੇ ਕੋਲ
सबसे बढ़ कर लाहौर से मलिका तरन्नुम नूरजहाँ की आवाज़ में لاهور سه ملیکا ترنم نور جهان کهآواز من
दमा दम मस्त कलंदर: ਦਮਾ-ਦਮ ਮਸ੍ਤ ਕਲੰਦਰ دمادم ماست قلندر
हिंदी में चल  उड़ जा रे पंछी,
 ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े, 
तितली उडी, 
चक्के पे चक्का, 
आओ बच्चो तुम्हे दिखाए झांकी हिंदुस्तान की: 
सौ साल पहले, जोत से
जोत जागते चलो:
मेरा रंग दे बसंती चोला: 
जोगी हम तो लुट गए :
 गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे: 
मै क्या करू राम मुझे बुड्ढा मिल गया:
 दोस्त दोस्त ना रहा:    
 जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
       

रविवार, 3 जून 2012

YAADEN 39 यादें (३९)

1962 की लड़ाई तो मुझे YAAD  नहीं जवाहरलाल नेहरु की मौत, गुलजारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधान मंत्री, लालबहादुर शास्त्री प्रधान-मंत्री, सरदार स्वर्णसिंह रक्षा मंत्री, सरदार अर्जुनसिंह थल सेनाध्यक्ष और 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई ज़ेहन में बरक़रार है 
लड़ाई के आसार होने पर हम ऊना चले गए; उस समय हरयाणा और हिमाचल प्रदेश नहीं थे; सारा पूर्वी पंजाब था; और ऊना होशियार जिले में था। वहां पर ही मैंने पंजाबी लिखना-पढ़ना सीखा था; नंगल और देहरा की बसें गुज़रा करती थीं; मुझे लगता था;शायद ये देहरादून ही होगा; कुछ दिन रूककर माताजी और मेरी दोनों छोटी बहनों सरोज और सुशीला को वहां छोड़कर में पिताजी के साथ वापस आ गया।
वापसी के वक़्त हम रात को होशियारपुर  में उसी हवेली में ठहरे; जो मेरे परदादा लाला रूपचंद बांसल (रूपाशाह) और उनके पिता लाला गोपालदास  बेचकर कश्मीर चले गए थे। उस हवेली की शान और अनुभूति आज भी मेरे दिल-दिमाग में है।
सर्दियों के दिन थे; लड़ाई लगी हुई थी, एक रात जिस समय मैं अकेला रजाई में दुबका हुआ था; बाहर चाचा मंगत रामजी ने टीन के दरवाजे पर जोर-जोर से लातें मारनी शुरू की; मैं बहुत डर  गया था; बाद में उन्होंने खुद हे आकर मुझे दिलासा दिया;
उस वक़्त गंदुम 50 पैसे और चना 40 पैसे किलो था चीनी का मामुल भाव R 1/ किलो था ज़बरदस्त ब्लैक सेर 10/ तक बिकी रायसिंहनगर एक दुकान में आग लगाने से कई बोरियां चीनी स्वाहा हो गई; उस दुकानदार पर BLACK से चीनी बेचने का मुक़दमा काफी चर्चित रहा था; 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 27 मई 2012

YAADEN (38) यादें (३८)

मेरे मझले मामा श्री केदारनाथ जी को पारिवारिक दुश्मनी के कारण किसी ने धीमा ज़हर दे दिया था. वे अक्सर बीमार रहते   थे. यद्यपि मैं छोटा था, तथापि घरेलु चर्चाओं से मुझे इन बातों   का एहसास था. 
एक होली के दिन शायद 1965; मामाजी को ग्लूकोज़ इत्यादि चढ़ाया  जा रहा था, वे गली की और खिड़की के पास चारपाई पर लेटे थे, बाहर से उन पर रंग के छींटे पड़  गए, और नाम मेरा लग गया. छोटा होने के बावजूद मैं बार बार सफाई देना चाह रहा था, पर कोई भी भी मेरी बात पर ध्यान नहीं दे रहा था, और मैंने अपने आप को निस्सहाय पाया.
1965 में मेरे चाचा श्री बालकृष्णजी उनको साथ लेकर; उनके चचेरे भाई श्री रामपाल सेठी के पास कश्मीर स्वस्थ्य लाभ के लिए गए. उन्हें लाभ नहीं हो पाया और 1965 की लड़ाई से पहले उनका कश्मीर में ही देहांत हो गया. उसके बाद मेरे ननिहाल पूरी तरह से नानुवाला छोड़ कर भानियावाला (देहरादून) चले गए
मेरे चाचा श्री बालकृष्ण जी का  देहांत 05.05.2012 को हनुमानगढ़ में हो गया. 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 20 मई 2012

YAADEN(37) यादें (३७)

एक दिन मैंने सोचा; देखा जायकि चटनी कैसे बनती है; बाहर रसोई में पत्थर  की कुण्डी थी; मैंने उसमे एक कागज़ रखा और जोर से बट्टा मारा तो पत्थर की कुण्डी दो फाड़ हो गयी ; और मैं चुपके से खिसक गया;वो दोनों टुकड़े शायद अब भी नानुवाला हमारे धर पड़े हैं;  ज्ञान बावरी का लड़का सहीराम मेरा हम उम्र था; उसकी तिपहिया साईकिल हमारे घर सामान  के साथ ऊंटनी से उतरी; मैंने मान लिया , साईकिल मेरी ही है;बड़ी मुश्किल से मुझसे चोरी उसे पहुँचाया गया;
उषा के लिए पेंट और कमीज़ आयी ; मुझे सुन्दर लगी; पिताजी के साथ बनारसीदस अनिल कुमार मल्होत्रा की दुकान पर गया; बाशी (सुभाष शर्मा ) चाचाजी साथ थे; गले तक फौजियों वाली पेंट, सफ़ेद रंग की कमीज़ नाहर सिंह दर्जी ने सिलाई की थी, जिसे पहन कर मैं बहुत खुश रहता था; श्रीराम  के पिता का नाम रतनचंद  वह 37 NP का कोतवाल था, चक के मृत पशुओं लो वह ही उठाते थे; वह पढ़ा-लिखा था; उसका दादा बाबुराम था, यद्यपि छूआछूत काफी थी, रतनचंद और बाबुराम दोनों बाप-बेटों की  दुकान पर पिताजी के पास काफी आमदरफ्त थी; रतनचंद  अक्सर मुझे LAHUR UNIVERSITY और MATRIC  पढाई की बातें किया करता था; श्रीराम की माता धनवंती को मैं मौसी कहता था; बाबुराम बच्चों के नाखून पर चमेली का तेल लगा कर चोरी वगेरा बताता था; एक बार मेरे दायें हाथ के नाखून पर भी उसने प्रयोग किया था ; झाड़ू लगाओ, भिश्ती पानी छिड़के, चोर का पता बताओ, सामान बताओ, जगह बताओ, पर खूब कोशिश करने पर भी मैं कुछ नहीं बता सका; श्रीराम तीसरी तक मुझसे आगे था, चौथी से छटी तक बराबर रहे फिर वह पीछे हो गया; मेरे  देहरादून से वापसआने के बाद वह और करनसिंह राजपूत  विजयनगर सिपाही लग गए थे, बादमें  मैं जब लालगढ़ गिरदावर के पद पर था, एक दिन संयोगवश रायसिंहनगर से बस में पिछले दरवाज़े से चढ़ा;मैंने नानुवाला अड्डे पर उसे आगे -आगे जाते देखा; तो मिलने की इच्छा से दौड़कर पीछे से जाकर उसका कन्धा पकड़ा, उसने मुड कर; देखा और मुझे डांट दिया _"लाला ! बन्दे नू कोई तमीज़ होनी चाहीदी  है " 
मैं बहुत ही रुआंसा हो गया था, सोच रहा था की मैंने पद को भुलाकर दोस्ती को बरकरार रखा; पर उसने पुलसिये जैसा ही किया;
वह चुनावड थाने में था, वहीँ उसकी मौत हो गयी; उसका परिवार अब चुनावड ही रहता है;


जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
Ashok, Tehsildar Hanumamgarh ९४१४०९४९९१
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