रविवार, 24 जून 2012

YAADEN (42) यादें (४२)

1965-66 में मैं, तेजा, गुरमेल, श्रीराम, विश्वनाथ चौथी में थे; उस वक़्त सुल्तान सुथार, किरण, पद्मा, धनीराम लाम्बा की लड़की राजकुमारी, मेरी बुआ सत्या देवी, कृष्ण मंडा का छोटा भाई बुधराम तीसरी में थे; सुल्तान राम की लिखाई सुन्दर थी;
पंडित रघुनाथदास की बड़ी लड़की चमेली दिल्ली में ब्याही थी, छोटी कौशल्या (छल्लो) व सेवक राम तुली की शादी एक ही दिन थी; दिल्ली से बारात आई थी, तीन दिन बारात रुकी, गर्मियों के दिन थे नहर बंद थी; पानी की बहुत किल्लत थी; बारात विदा हो रही थी जब नहर में पानी आया;
ठाकुर संतराम जी की छोटी बेटी कांता की शादी ठाकुर ज्ञानचंद के बेटे रामसिंह के साथ हुई;
 उसी दिन तीसरी में पढने वाली राजकुमारी की शादी भी हुई; हमीरा जी के पोते, लूणा जी मंडा  के बेटे बुधराम की शादी भी उसी दरम्यान हुई थी; अपने से एक दर्जा नीचे पढने वाले इन दोनों की शादियों से मैं काफी हैरान, परेशान था;
उस साल आस-पास के गावों के विद्यार्थी सालाना इम्तिहान देनें हमारे गाँव आये थे; सबने अपने-अपने घर एक-एक साथी को रखा था; शामगढ़ का एक लड़का मेरे साथ हमारे घर रुका था; उन पाँच-चार दिनों में हम दोनों पूरी तरह घुल-मिल गए थे; उसके बाद आज 46 साल बीतने पर भी हम दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी है;
चौथी पास करके जून1966 में मैं अपने बड़े मामा वेदप्रकाश जी के साथ पांचवी पढने के लिए, भानियावाला चला गया था ! 

 जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
 Ashok, Tehsildar Hanumamgarh 9414094991  

रविवार, 17 जून 2012

YAADEN (41) यादें (४१)

1965 की लड़ाई में भारतीय जवानों ने अपने सीने पर बमगोले बांध कर AMERICAN PATERON TANKs के परखचे उड़ा दिए, पाकिस्तान की शिकस्त, AMERICA की किरकरी, विश्व कूटनीति में GENERAL याहिया खान ,अयूब खान और जुल्फिकार अली भुट्टो की गिरावट के साथ ही हमारे यहाँ पंजाबी का गीत मशहूर हुआ-

अयूब खां ते भुट्टो ने की नफा कमा लेया ; गिद्दडाँ ने जंग शेरां नाळ ला लेया

ਅਯੂਬ ਖਾਂ ਤੇ ਭੁੱਟੋ ਨੇ ਕੀ ਨਫ਼ਾ ਕਮਾ ਲੇਯਾ; ਗਿਦੜਾ ਨੇ ਜੰਗ ਸ਼ੇਰਾਂ ਨਾਲ ਲਾ ਲੇਯਾ

ताशकंद समझोता, प्रधान-मंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत, गुलजारीलाल नंदा दुबारा कार्यवाहक प्रधान-मंत्री और फिर इंदिरागांधी का प्रधान-मंत्री बनना बहुत तीव्र घटना क्रम चला;
सुभाष चन्द्र बोस के बाद शास्त्री जी की दूसरी मौत है, जिसमे शक की सुइयां आज तक घूम रही हैं; 
इसके तुरंत बाद संत फतेहसिंह ने पंजाबी-सूबा आन्दोलन चलाया; जिससे हरयाणा और हिमाचल प्रदेश का जन्म हुआ; उस समय मैं चौथी में पढता था; चंडीगढ़ का मसला काफी चर्चा में थे; मैंने भी छः नए पैसे के POST-CARD पर अपनी सलाह लिखकर- इंदिरागांधी, प्रधान मंत्री दिल्ली के पते पर भेजी थी कि;

चंडीगढ़ किसी भी राज्य को न दिया जावे;

किसी राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दे पर मेरे बाल -मन की यह प्रथम सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी;     

Ashok, Tehsildar Hanumamgarh 9414094991
जय
हिंद
جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 10 जून 2012

YAADEN (40) यादें (४०)


RADIO के साथ तार जोड़कर ऊपर छत पर या ऊँची जगह पर जालीदार एंटेना बांधा जाता था. रेडियो की BATTERY भी रेडियो से अलग लगभग 
12"x8"x4 " माप की होती थी लाल काले रंग पर 9 के बीच से बिल्ली छलांग लगाती हुई होती थी बाद में छोटे माप की और फिर radio के अन्दर ही fit होने वाली आने लगी रेडियो का सालाना
LICENCE र 7.5 डाकघर में जमा होते थे; जमा न कराने पर बाकायदा जुरमाना लगता था. डाक-तार विभाग एक ही थे बाद में दोनों अलग हुए और फिर प्रसार भारती और BSNL के रूप में सार्वजनिक उपक्रमों का गठन हुआ निकिल के एंटेना वाले TRANSISTER आने के बाद उस तरह के रेडियो लुप्त PRAY हो गए. 
रायसिंह नगर से चाचा नारायण सिंह अपना
TRANSISTER लेकर जब भी आते; हमारे घर ही रुकते थे, हालाँकि उनके भाई ध्यान सिंह और प्रीतम सिंह आने पर अपने राजपूत रिश्तेदारों के घर ही रुकते थे; उन दिनों चाचा  चरण सिंह और कृष्ण बिश्नोई  सरदार अजायब सिंह के ट्रेक्टर पर काम करता था; कृष्ण शुद्ध पंजाबी बोलता था .
गाँव में एक MASSEY FURGUSSION और एक FORDSON 2 ही TRACTOR थे; तेजा के पिता मल्कियत सिंह संधू के पास JEEP थी जिसके ACCIDENT में उनकी मृत्यु हो गयी थी;
 उस ज़माने में मशहूर पंजाबी गायकों में सुरेंदर कौर, प्रकाश कौर, आसासिंह मस्ताना, लालचंद यमला जट, बाबु सिंह मान माराड़ावाला, रम्पटा थे. 
बत्ती बाल के बनेरे उत्ते रखदी हाँ:
ਬੱਤੀ ਬਲ ਕੇ ਬਨੇਰੇ ਉੱਤੇ ਰਖਦੀ ਹਾਂ
कता परीतां नाल चरखा चनण दा:
ਕਤਾਂ ਪਰੀਤਾਂ ਨਾਲ ਚਰਖਾ ਚੰਨਣ ਦਾ
जुत्ती कसूरी पैर न पूरी ,हाय रब्बा वे सानु तुरना पया:
ਜੁੱਤੀ ਕਸੂਰੀ, ਪੈਰ ਨ ਪੂਰੀ ਹਾਯ ਰੱਬਾ ਵੇ ਸਾਨੂੰ ਤੁਰਨਾ ਪਾਯਾ
आवो लोको नस के मेरा जीजा वेखो हस के:
ਆਵੋ ਲੋਕੋ  ਨਾਸ ਕੇ ਮੇਰਾ ਜੀਜਾ ਵੇਖੋ ਹਾਸ ਕੇ
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग मईया: 
ਲਠੇ ਦੀ ਚਾਦਰ ਉੱਤੇ ਸਲੇਟੀ ਉੱਤੇ ਸਲੇਟੀ ਰੰਗ ਮਹਿਯਾ
जग देया चनणा तू मुख ना लुका वे:
 ਜਗ ਦੇਯਾ ਚੰਨਣਾ ਤੂੰ ਮੁਖ ਨਾ ਲੁਕਾ ਵੇ
RAMPTA जा वडेआ लुधियाने
ਰੰਪਟਾ ਜਾ ਵਡੇਆ ਲੁਧਿਆਣਾ  
काला डोरिया कुंडे नल अडया, छोटा देवरा भाबी नाल लडेया
ਕਾਲਾ ਡੋਰਿਯਾ ਕੂੰਡੇ ਨਾਲ ਅੜੇਆ, ਛੋਟਾ ਦੇਵਰਾ ਭਾਬੀ ਨਾਲ ਲੜੇਆ   
तड़के-तड़के जान्दिये मुटियारे नी, कंडा चुबा तेरे पैर बंकिये नारे नी
ਤੜਕੇ- ਤੜਕੇ ਜਾਂਦੀਏ ਮੁਟਿਆਰੇ ਨੀ, ਕੰਡਾ ਚੁਬਾ ਤੇਰੇ ਪੈਰ ਬੰਕਿਏ ਨਾਰੇ ਨੀ  
भांवे बोल ते भांवे ना बोल, चन्ना वस् अखियाँ दे कोल
ਭਾਂਵੇ ਬੋਲ ਤੇ ਭਾਂਵੇ ਨਾ ਬੋਲ, ਵੇ ਚੰਨਾ ਵਸ ਅਖਿਯਾਂ ਦੇ ਕੋਲ
सबसे बढ़ कर लाहौर से मलिका तरन्नुम नूरजहाँ की आवाज़ में لاهور سه ملیکا ترنم نور جهان کهآواز من
दमा दम मस्त कलंदर: ਦਮਾ-ਦਮ ਮਸ੍ਤ ਕਲੰਦਰ دمادم ماست قلندر
हिंदी में चल  उड़ जा रे पंछी,
 ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े, 
तितली उडी, 
चक्के पे चक्का, 
आओ बच्चो तुम्हे दिखाए झांकी हिंदुस्तान की: 
सौ साल पहले, जोत से
जोत जागते चलो:
मेरा रंग दे बसंती चोला: 
जोगी हम तो लुट गए :
 गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे: 
मै क्या करू राम मुझे बुड्ढा मिल गया:
 दोस्त दोस्त ना रहा:    
 जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
       

रविवार, 3 जून 2012

YAADEN 39 यादें (३९)

1962 की लड़ाई तो मुझे YAAD  नहीं जवाहरलाल नेहरु की मौत, गुलजारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधान मंत्री, लालबहादुर शास्त्री प्रधान-मंत्री, सरदार स्वर्णसिंह रक्षा मंत्री, सरदार अर्जुनसिंह थल सेनाध्यक्ष और 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई ज़ेहन में बरक़रार है 
लड़ाई के आसार होने पर हम ऊना चले गए; उस समय हरयाणा और हिमाचल प्रदेश नहीं थे; सारा पूर्वी पंजाब था; और ऊना होशियार जिले में था। वहां पर ही मैंने पंजाबी लिखना-पढ़ना सीखा था; नंगल और देहरा की बसें गुज़रा करती थीं; मुझे लगता था;शायद ये देहरादून ही होगा; कुछ दिन रूककर माताजी और मेरी दोनों छोटी बहनों सरोज और सुशीला को वहां छोड़कर में पिताजी के साथ वापस आ गया।
वापसी के वक़्त हम रात को होशियारपुर  में उसी हवेली में ठहरे; जो मेरे परदादा लाला रूपचंद बांसल (रूपाशाह) और उनके पिता लाला गोपालदास  बेचकर कश्मीर चले गए थे। उस हवेली की शान और अनुभूति आज भी मेरे दिल-दिमाग में है।
सर्दियों के दिन थे; लड़ाई लगी हुई थी, एक रात जिस समय मैं अकेला रजाई में दुबका हुआ था; बाहर चाचा मंगत रामजी ने टीन के दरवाजे पर जोर-जोर से लातें मारनी शुरू की; मैं बहुत डर  गया था; बाद में उन्होंने खुद हे आकर मुझे दिलासा दिया;
उस वक़्त गंदुम 50 पैसे और चना 40 पैसे किलो था चीनी का मामुल भाव R 1/ किलो था ज़बरदस्त ब्लैक सेर 10/ तक बिकी रायसिंहनगर एक दुकान में आग लगाने से कई बोरियां चीनी स्वाहा हो गई; उस दुकानदार पर BLACK से चीनी बेचने का मुक़दमा काफी चर्चित रहा था; 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 27 मई 2012

YAADEN (38) यादें (३८)

मेरे मझले मामा श्री केदारनाथ जी को पारिवारिक दुश्मनी के कारण किसी ने धीमा ज़हर दे दिया था. वे अक्सर बीमार रहते   थे. यद्यपि मैं छोटा था, तथापि घरेलु चर्चाओं से मुझे इन बातों   का एहसास था. 
एक होली के दिन शायद 1965; मामाजी को ग्लूकोज़ इत्यादि चढ़ाया  जा रहा था, वे गली की और खिड़की के पास चारपाई पर लेटे थे, बाहर से उन पर रंग के छींटे पड़  गए, और नाम मेरा लग गया. छोटा होने के बावजूद मैं बार बार सफाई देना चाह रहा था, पर कोई भी भी मेरी बात पर ध्यान नहीं दे रहा था, और मैंने अपने आप को निस्सहाय पाया.
1965 में मेरे चाचा श्री बालकृष्णजी उनको साथ लेकर; उनके चचेरे भाई श्री रामपाल सेठी के पास कश्मीर स्वस्थ्य लाभ के लिए गए. उन्हें लाभ नहीं हो पाया और 1965 की लड़ाई से पहले उनका कश्मीर में ही देहांत हो गया. उसके बाद मेरे ननिहाल पूरी तरह से नानुवाला छोड़ कर भानियावाला (देहरादून) चले गए
मेरे चाचा श्री बालकृष्ण जी का  देहांत 05.05.2012 को हनुमानगढ़ में हो गया. 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 20 मई 2012

YAADEN(37) यादें (३७)

एक दिन मैंने सोचा; देखा जायकि चटनी कैसे बनती है; बाहर रसोई में पत्थर  की कुण्डी थी; मैंने उसमे एक कागज़ रखा और जोर से बट्टा मारा तो पत्थर की कुण्डी दो फाड़ हो गयी ; और मैं चुपके से खिसक गया;वो दोनों टुकड़े शायद अब भी नानुवाला हमारे धर पड़े हैं;  ज्ञान बावरी का लड़का सहीराम मेरा हम उम्र था; उसकी तिपहिया साईकिल हमारे घर सामान  के साथ ऊंटनी से उतरी; मैंने मान लिया , साईकिल मेरी ही है;बड़ी मुश्किल से मुझसे चोरी उसे पहुँचाया गया;
उषा के लिए पेंट और कमीज़ आयी ; मुझे सुन्दर लगी; पिताजी के साथ बनारसीदस अनिल कुमार मल्होत्रा की दुकान पर गया; बाशी (सुभाष शर्मा ) चाचाजी साथ थे; गले तक फौजियों वाली पेंट, सफ़ेद रंग की कमीज़ नाहर सिंह दर्जी ने सिलाई की थी, जिसे पहन कर मैं बहुत खुश रहता था; श्रीराम  के पिता का नाम रतनचंद  वह 37 NP का कोतवाल था, चक के मृत पशुओं लो वह ही उठाते थे; वह पढ़ा-लिखा था; उसका दादा बाबुराम था, यद्यपि छूआछूत काफी थी, रतनचंद और बाबुराम दोनों बाप-बेटों की  दुकान पर पिताजी के पास काफी आमदरफ्त थी; रतनचंद  अक्सर मुझे LAHUR UNIVERSITY और MATRIC  पढाई की बातें किया करता था; श्रीराम की माता धनवंती को मैं मौसी कहता था; बाबुराम बच्चों के नाखून पर चमेली का तेल लगा कर चोरी वगेरा बताता था; एक बार मेरे दायें हाथ के नाखून पर भी उसने प्रयोग किया था ; झाड़ू लगाओ, भिश्ती पानी छिड़के, चोर का पता बताओ, सामान बताओ, जगह बताओ, पर खूब कोशिश करने पर भी मैं कुछ नहीं बता सका; श्रीराम तीसरी तक मुझसे आगे था, चौथी से छटी तक बराबर रहे फिर वह पीछे हो गया; मेरे  देहरादून से वापसआने के बाद वह और करनसिंह राजपूत  विजयनगर सिपाही लग गए थे, बादमें  मैं जब लालगढ़ गिरदावर के पद पर था, एक दिन संयोगवश रायसिंहनगर से बस में पिछले दरवाज़े से चढ़ा;मैंने नानुवाला अड्डे पर उसे आगे -आगे जाते देखा; तो मिलने की इच्छा से दौड़कर पीछे से जाकर उसका कन्धा पकड़ा, उसने मुड कर; देखा और मुझे डांट दिया _"लाला ! बन्दे नू कोई तमीज़ होनी चाहीदी  है " 
मैं बहुत ही रुआंसा हो गया था, सोच रहा था की मैंने पद को भुलाकर दोस्ती को बरकरार रखा; पर उसने पुलसिये जैसा ही किया;
वह चुनावड थाने में था, वहीँ उसकी मौत हो गयी; उसका परिवार अब चुनावड ही रहता है;


जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
Ashok, Tehsildar Hanumamgarh ९४१४०९४९९१
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रविवार, 13 मई 2012

YAADEN(36) यादें (३६)

श्रीराम, विश्वनाथ fail होने पर चौथी में हमारे साथ हो गए. रोज़ शाम को पहाड़े बोलने होते थे; पौवा अद्धा पौना सवाया ड्योढ़ा से लेकर आगे तक. मेरी और गुरमेल की एक दुसरे से आगे निकलने की जिद में हम दोनों को 27 तक याद थे

हिंदी, गणित, सामाजिक ज्ञान,  सामान्य विज्ञान,  चित्रकला और उद्योग, शाम को उद्योग के रूप में प्रांगण की साफ-सफाई, पेड़ों को पानी, आदि करना होता था; शनिवार को आधी छुट्टी के बाद बाल-सभा होती थी; तेजासिंह आँखें बंद करके मुंह  ऊपर को करके एक हास्य-गीत सुनाता था - 

आप करदी  दो-  दो   गुत्तां; मैनू  कहिंदी टिंड  मना  !
आप जांदी सिल्मा वेखण;मैनू कहिंदी मुंडा खिढ़ा !! 
ਆਪ ਕਰਦੀ ਦੋ ਦੋ ਗੁੱਤਾਂ; ਮੈਨੂ ਕਹਿੰਦੀ ਟਿੰਡ ਮਨਾ !
ਆਪ ਜਾਂਦੀ ਸਿਲਾਮਾ ਵੈਸ਼ਨ; ਮੈਨੂ ਕਹਿੰਦੀ ਮੁੰਡਾ ਖਡਾ !!
गुरमेल सिंह का गीत बहुत ही भावपूर्ण था; उस समय नासमझ होने पर भी देश-विभाजन की त्रासदी का दर्द दिल में भर जाता था-

गड्डी भर के अमरसरों तोरी                   ਗੱਡੀ ਭਰ ਕੇ ਅਮ੍ਬਰ ਸਾਰੋੰ ਤੋਰੀ

इस के आगे के बोल मुझे याद नहीं ; पर उसका शाब्दिक अर्थ ये है क़ि; -

अमृतसर और लाहौर के बीच rail लाशों से भरी हुई आती-जाती थी* 

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

Ashok, Tehsildar Hanumamgarh ९४१४०९४९९१
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रविवार, 6 मई 2012

YAADEN(35) यादें (३५)

जवाहर लाल नेहरु की मौत के दूसरे दिन 28 .05 .1964 को अलवर से मेरे फूफा कस्तूरी लाल कोहली आए पता चला कि अलवर से रेवाड़ी सादुलपुर हनुमानगढ़ सूरतगढ़ से होकर सभी HOTEL और चाय के ढाबे बंद थे; वापस जाते वक़्त सूरत गाड़ी बदलने के दरम्यान उनका सामान चोरी हो गया था;

मिटटी का तेल 18 LITRE के कनस्तरों में आता था; सूरज छाप, हाथी छाप, चाबी छाप, बुड्ढा छाप 16 बीड़ी का BANDAL 6 नए पैसे, 24 बीड़ी का BANDAL 10 पैसे, सुभाषचंद्र बोस छाप माचिस, LAMP की सिगरेट, मशहूर थी;POST CARD 6 पैसे, अंतर्देशीय 10 पैसे, लिफाफा 15 पैसे व डाक रजिस्ट्री 25 पैसे की थी; 
खाली कनस्तरों से पिताजी ने सरदारा  सिंह तरखान से लगभग 8X8 वर्ग फुट का दरवाजा बनवाया था; मुझे आज भी वैसे ही नज़र आता है, 
सफेद दाढ़ी वाला सरदारा मिस्त्री, खेतुराम बिशम्बर दास गिद्दड़वाह वालों की नसवार सूँघता हुआ;   हमारी दुकान के सामने बैठा हुआ,हाथ में तेसा लेकर, बांसों का बड़ा सारा FRAME बना कर उसके दोनों तरफ कटे हुए कनस्तरों में लोहे की कीलें ठोक रहा है और मै गिलास में उसके लिए चाय लेकर जा रहा हूँ !   

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 29 अप्रैल 2012

YAADEN(34) यादें (३४)

सामान्यतः मै शरारती नहीं था किन्तु जिज्ञासु अवश्य था. पिताजी के साथ दुकान के छोटे मोटे कम करता था. लालटेन व चिमनी रोज़ साफ करना मेरा कम था. दुकान पर लालटेन टांगने के लिए छत से नीचे आधी उंचाई तक सूतली की रस्सी बाँधी रहती थी, जिसके नीचे लोहे का  कुंडा (S)लगा था. एक दिन पिताजी मुझे बिठा कर काम गए. मैं झूलने का विचार किया. थड़ी पर चढ़ कर कुंडा दायें गाल में डाला; और झूल गया. लोहे का कुंडा मेरे गाल के आर-पर हो गया. पता नहीं क्यों ? न तो मुझे दर्द हुआ, न ही डांट पड़ी.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 22 अप्रैल 2012

YAADEN (33) यादें (३३)

हमारे घर से उत्तर दिशा में रायसिखों के घर थे, करनैलसिंह जरनैल सिंह (केलि जेली) की दिवार हमारे साथ लगती थी, उस वक़्त कुंदन सिंह, लद्दासिंह (लद्दू) भी वहीँ रहते थे बाद में उन्होंने पश्चिम दिशा में मामा हरिराम कडवासरा से उत्तर में चिपता हुआ बनाया था; शमीर सिंह का परिवार कुछ दूर नहर के पास था; वे लोग शराब का धंधा करते थे, अक्सर पुलिस आती रहती थी; उत्तर-पश्चिम में नहर के दोनों ओर सरकनों में शराब की भट्ठियां बरामद होती रहती थी; ये शाह-मात और लुका-छिपी चलती ही रहती थी;करनैल की शादी की मुझे पूरी होश है; फाजिल्का से उनके काफी रिश्तेदार आये थे; ;उनमे से नारायण सिंह (नैणा) ने शराब पीकर काफी उत्पात किया था तलवारें भी चली थीं; कोई भागता हुआ दीवार फांद कर हमारे घर में से भाग रहा था कोई गालियाँ निकाल रहा था, कोई पकड़ने को पीछे दौड़ रहा था किसी के खून निकल रहा था, कोई तलवार लहरा रहा था; रोने-धोने पकड़ने-पकड़वाने गालियाँ निकालने छुड़ाने में औरतें भी शामिल थीं;  करनैल की पत्नी हमारे साथ घर परिवार जैसी घुल-मिल गई थी; मै उसे जग्गो भाभी कहता था; बाद में इन लोगों को RCP
में ज़मीनें ALOT हो गई थीं वे सरदारपुरा बीका (खिचियाँ) चले गए; करनैल सिंह का परिवार अभी भी हमारे पड़ोस में है;

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 15 अप्रैल 2012

YAADEN (32 )यादें (३२)

ग्राम पंचायत नानुवाला में 33 35 36 37 38  55 56 व 57 NP के चक थे, 1962 से 65 श्योकरण सहारण 38
NP (बल्लेवाला) सरपंच थे; जो मेरे मामाजी वेदप्रकाश के मित्र होने के नाते मेरे मामा ही थे; 1965 के चुनाव में उनके सामने हनुमान बिश्नोई 57NP थे; तकनीकी कारणों से श्योकरण जी का नामांकन ख़ारिज हो गया; कृष्णलाल सुथार 36NP (नानुवाला) हमारे उम्मीदवार हार गए; उस समय तक हनुमान जी की छवि अच्छी नहीं थी, सरपंच बनने के बाद उन्होंने शराब छोड़ दी; पुणे जाकर  ओशो रजनीश का शिष्यत्व में भगवे वस्त्र और नाम स्वामी आनंद  ऋषि ग्रहण कर लिया था* फिर 13 साल चुनाव नहीं हुए; 1978 में श्योकरण सहारण ने जसवीर सिंह 56NP को 46 मतों से हराया* तब तक मेरे ननिहाल का परिवार पूरी तरह भनियावाला/डोईवाला जा चुका था, मैं अपनी पढाई पूरी करके देहरादून से वापस आकर SBBJ रायसिंहनगर में अस्थाई काशिएर था;उससे पहले 1976 में NATIONAL FERTILIZERS LIMITED पानीपत में JUNIOR CHEMICAL OPERATOR के पद पर चयन होकर तूतीकोरन जाने का आदेश आ चूका था; जहाँ माता-पिता ने मुझे नहीं जाने दिया, फिर नहरी पटवारी के पद पर चयन होकर प्रशिक्षण पूर्ण कर चुका था; AIR INDIA में assistant flight purser की लिखित प्रतियोगिता में सफल हो चुका था;    और मेरी शादी भी हो चुकी थी*                    

  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 8 अप्रैल 2012

YAADEN (31) यादें (३१)

31दिसंबर 1964 को हम सब नए स्कूल के बड़े वले कमरे में डाली गई मिटटी की कुटी कर रहे थे उस दिन से आगे छुट्टियाँ होनी थीं; कृष्ण मंडा और नत्थू सुथार एक एक ईंट लेकर कुटी कर रहे थे, मैं तीसरी में था और वे दोनों पांचवी में ; मुझे अच्छी तरह याद है कमरे का उत्तर-पश्चिम कोना था, मैं हाथों से अर्ध गीली मिटटी थपक रहा था; शायद हो सकता है, कि उन्होंने मुझे टोका हो या न टोका हो ! मेरे दायें हाथ के थपके के ऊपर कृष्ण की ईंट पड़ गई;  मेरी कनिष्ठ का नाख़ून उतर गया और खून निकलने लगा; वे दोनों घबरा गए थे; मै न तो रोया न ही उनसे कोई शिकायत की; शाम को वे दोनों SKIN OINMENT की TUBE लकर घर आये और मुझे देकर गए;; मेरे माता-पिता ने भी इसे सामान्य घटना के रूप में लियाथा*  वैसे भी कृष्ण के पिता लूणा जी मंडा सभ्रांत व शांत प्रकृति के थे हालाँकि उसके  दादा हमीरा जी और चाचा शंकर की छवि उतनी अच्छी नहीं थी; नत्थू के पिता हनुमान जी सुथार की मेरे पिताजी के साथ अच्छी उठ-बैठ थी*    दायें हाथ की कनिष्ठा का नाखून आज भी उस घटना का गवाह है*            
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 1 अप्रैल 2012

YAADEN (30) यादें (३०)

कक्षा दो में हिंदी की किताब में एक पाठ था सुजाता की खीर.
महात्मा बुद्ध को सुजाता की खीर खाकर बोध हुआ कि, दुःख का कारण क्या है? इस अंतिम पंक्ति के साथ पाठ पूरा हो गया था. मैं बहुत बेचैन हो गया था, उस कारण को जानने को. ये बेचैनी चार साल चली. कक्षा छह
में आकर मैंने पड़ा कि, दुःख का कारण है; इच्छा. उसके बाद ये सिद्धांत मै याद रखने का प्रयत्न करता आया हूँ !
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

शनिवार, 24 मार्च 2012

YAADEN (29) यादें (२९)

पिताजी अक्सर दुकान का हिसाब मुझसे करवाते थे. इसलिए मै गणित में
बहुत होशियार था. इसके अलावा रिश्तेदारों को हिंदी के पत्र लिखना और पढना भी मेरे जुम्मे था. इ बार धनीराम जी ने अपनी बहन को देवबंद Money order भेजना था मैंने money order form भरना शुरू किया उसमे उपार लिखा था - पाने वाले का नाम मैंने उसमे भर दिया - धनीराम मार्फ़त जेठाराम पनवाड़ी सब्जी बाज़ार रायसिंहनगर; फिर नीचे लिखा था भेजने वाले का नाम तो मैं चक्कर खा गया की दोनों जगह भेजने वाले का पता नहीं हो सकता form के छपे में खराबी हो सकती है; इसलिए मैंने दुसरे स्थान पर देवबंद का पता लिख दिया दुसरे दिन रायसिंहनगर से लौट कर पिताजी ने मुझे डांटा की ऊपर प्राप्तकर्ता का और नीचे भेजने वाले का पता लिखना चाहिए था; मैं समझ नहीं पा रहा था की फिर डाक खाने वालों ने form के ऊपर पाने वाले का पता क्यों छापा है ? (पंजाबी में पानेवाला के अर्थ है - भेजने वाला)
उस वक़्त moneyorder
form दो नए पैसे का और money order का commission पचास पैसे प्रति दस रुपये था*
   
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      

रविवार, 18 मार्च 2012

YAADEN(28) यादें (२८)

हमारे गुरूजी जगरूप सिंह जी लापरवाह किस्म के थे* हम सभी विद्यार्थियों को अपनी-अपनी बारी से स्कूल में  झाड़ू सफाई करनी होती थी; एक सुबह जब निरीक्षक आए, कूड़ा दरवाजे के सामने पड़ा था; गुरूजी उस समय तक नहीं आए थे. वर्ष 1978-82 के दौरान मैं नहरी पटवारी था, वे 5 BLM में पदस्थापित थे* एक दिन बस में मैने उन्हें पहचान लिया और चरण-स्पर्श किया. भैराराम जी अनुशासन-प्रिय थे और सख्त-सजा 
 हाथ ऊपर करके खड़ा करना, डंडा या मुर्गा बनाना थी. सेवकसिंह जी व भैराराम जी की लिखावट सुन्दर थी. सेवकसिंह जी संधू का ननिहाल हमारे गाँव में ही था उनको बोलचाल में सुखदेव कहते थे. बाद में लगभग 1985 में मैं निरीक्षक था, और वे पंचायत समिति गंगानगर में थे*
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 11 मार्च 2012

YAADEN(27) यादें (२७)

गाँव में आने जाने वाले साधू संत और यात्री व्यापारियों के प्रति विश्वास भाव था. उनके ठहरने खाने की व्यवस्थाएं की जाती थी. हमारे घर
भी यदा-कदा साधू-महात्मा या व्यापारी रुकते रहते थे. कथा प्रसंग भी
होते थे. अमृतसर से दो वंजारे पांच-चार महीने में अक्सर फेरी
लगाने आते थे उन में से एक हमारे घर ही रुकते थे. और सुबह जाते
वक़्त मेरी छोटी बहनों सरोज सुशीला व शशि को चूडियाँ देते थे.
गायों के झुण्ड लेकर मिएँ आते थे. हम उनसे 8/- रूपये सेर मक्खन
लेकर 12 / रुपये किलो घी बेचते थे उस वक़्त चना 40 पैसे व गेहूं 50 पैसे किलो खरीदते थे ! 
-- जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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सोमवार, 5 मार्च 2012

YAADEN(26) यादें (२६)

हमारे गुरूजी ओमप्रकाश जी सरल और सहयोगी स्वाभाव के थे. तीसरी कक्षा में पहली बार लिखित परीक्षा होने से मैं उत्साहित था.प्रश्न था, "कृष्ण के मामा का नाम क्या था?" मैने लिखा 'कंस'. बाद में उन्होंने समझाया लिखना चाहिए,
कृष्ण के मामा का नाम कंस था. शरद पुर्मिमा पर वे हमें नानुवाला कोठी लेकर गए. थाली चम्मच, घर से लेकर गए. वहां खीर बनाई
नहर में नहाये, फिर खीर खाकर वापस आए;
 मेरी चम्मच नहाने धोने के दौरान गुम गई. 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

YAADEN(25) यादें(२५)

मेरे बड़े मामा वेदप्रकाश जी की सरपंच श्योकरण सहारण,  हरी राम कडवासरा तथा दीना नाथ आनंद के साथ दोस्ती थी. इस  नाते मैं इनको मामा ही कहता था. नानुवाला गाँव बसाने  वाले  चौधरी नानुराम के पुत्र श्री श्योकरण गोदारा मेरे स्वर्गीय नाना हरिचंद सेठी के मित्र बन गए थे, इस नाते मैं उनको नाना नानी व् उनके पुत्रो मनीराम गोदारा, महेंद्र गोदारा व् बलराम गोदारा को मामा कहता था. वे बहुत बाद में मेरे नौकरी लगने के आस पास मृत्यु पर्यंत  तक भी मुझसे दौहित्र जैसा ही व्यवहार करते रहे.  सरपंच श्योकरण सहारण मेरे मामाजी को अपने गाँव 38NP ले
गए, मेरे मामाजी ने वहां दुकान की, तब मैं कई बार वहां जाकर रहाउसके बाद बड़े मामाजी बड़े मौसाजी के पास डोईवाला (देहरादून) चले गए उन्होंने भानियावाला में दुकान की.
02.07.1964 वृहस्पतिवार  को मेरे बड़े मामाजी की शादी हुई. मैं पिताजी के साथ जाकर बनारसीदास अनिल कुमार मल्होत्रा की दुकान से कपडे खरीदने गया था. 101/ रुपये के कपडे आये थे. शाम को आठ बजे रेल से जाना था. रायसिंह नगर में दादा गुरादित्तामल के होटल में सब इकट्ठे हुए. छोटे मामा सुभाषचन्द्र जी संदूक उठाने लगे तो उसका तीखा कोने मेरी छोटी बहन सरोज के सिर में लगा और वह बेहोश हो गई . मुश्किल से उसे होश आया. मीटरलाइन की गाड़ी से गंगानगर, हनुमानगढ़ और बठिंडा. आगे बड़ी गाड़ी से अम्बाला, वहा से बदलकर  सहारनपुर. आगे बस पर देहरादून और दूसरी बस पर लच्छीवाला . अपने होश में ये मेरी पहली रेल और बस यात्रा थी. माँ ने बताया की उससे पहले भी वे मुझे लेकर देहरादून गए थे.
मामाजी की शादी में मुझे कई प्रकार के अनुभब हुए. लच्छी वाला में मौसा जी और उनकेभाई लकड़ी की छत वाले दो मंजिला मकानों में रहते थे. बीच में लकड़ी की ही सीढ़ी थी. लगभग हर समय बरसात होती रहती थी. मेरा हम उम्र मौसेर गौरीश्याम उर्फ़ बब्बू मुझे कन्धों पर बिठा कर घूम रहा था. मैंने उसे कहा - अगर मुझे गिराओ तो पक्की जगह पर ही गिरना, कीचड में गिरने से मेरे कपडे ख़राब हो जायंगे. बाद में रिश्तेदारों में  मेरे कथन की खूब चर्चा हुई, उस समय मैं दूसरी पास करके तीसरी में हो चूका था.
उत्तर प्रदेश परिवहन की पीले रंग की बस को हमने झंडियों से सजाया, और बारात प्रेमनगर रवाना हुई. बारात दुसरे दिन दोपहर के खाने तक रुकी. दूर के एक रिश्तेदार डाक्टर के पास
TORCH में छोटा सा पंखा लगा हुआ था, जिससे लग्न मंडप में वो मामाजी को हवा कर रहे थे. दहेज़ में TABLE  FAN  और  TABLE  LAMP  भी थे. इन दोनों चीजों को लेकर मेरे मन में ये विश्वास था की इन दोनों के तार आपस में जोड़ देने से दोनों चलने लगेंगे, सबकी नज़रों से बच कर मैंने थोडा बहुत प्रयास किया भी.
और मैं बड़ा प्रफुल्लित होकर नानुवाला लौटा.  कुछ समय बाद मेरे मझले मामा केदारनाथ जी बड़ी मामी जी निर्मल रानी को नानुवाला लेकर आये. उनको राय सिंह नगर से जीप में लेकर आये, हमने घर में LAUD SPEAKAR लगाया, और उस समय मुझे पंख लगे हुए थे.
     
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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

YAADEN (24) यादें (24)

तेजा सिंह, गुरमेल सिंह व मेरी मित्रता ठीक थी. उसका एक कारण ये भी थे कि हम तीनो ही पंजाबी हैं; और हमारे परिवारों में भी मिलना जुलना था, हम तीनो के घर स्कूल से लगभग उत्तर दिशा में थे; हालाँकि तेजसिंह का घर नहर पार उत्तर पूर्व कोने पर था और गुरमेल का नहर के किनारे, उस समय हम लगभग नासमझ थे. और एक दुसरे पर भरोसा करते थे; एक दिन हम तीनों साथ-साथ स्कूल से घर रवाना हुए थे; ठाकर सिंह (कैलाश, मोहन सिंह, कर्ण सिंह, नरसिंह, सोमा सुमित्रा) के घर से मुझे अपने घर पश्चिम को मुड़ना था; और उन दोनों को सीधा उत्तर नहर कि तरफ जाना था; तेजा ने मुझे बातों में लगाये रखा, और अचानक गुरमेल ने मेरी पीठ पर मुक्का मारा, और दोनों एकदम से अपने घरों को भाग गए; मेरे भोले मन को, उस दिन पहली बार आस्तीन के सांप का अहसास हुआ था#
पर मैंने न तो शिकायत की; और न ही मित्रता छोड़ी* 

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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

YAADEN (23) यादें (२३)

मेरे साथ कक्षा में गुरमेल सिंह, तेजा सिंह, मेरी दोनों मौसियाँ सोमा व कमला हम पांच सहपाठी थे;  हमारे से पीछे मोहन सिंह, श्याम सिंह, जसवीर सिंह, महेंद्र सिंह (राजपूत), सुल्तान सुथार, काशी सुथार, महेंद्रसिंह (छोटा मिंदा), किरना, पदमा और मेरी बुआ सत्या देवी थीं. हमारे से आगे महेंद्र सिंह (बड़ा मिंदा), मदन गोदारा, मेरे चाचा मदन लाल,  श्रीराम, कैलाश देवी, गुड्डी कौर. विश्वनाथ और उसकी बहन बिमला  थीं; उससे आगे कृष्ण मंडा, नत्थू राम सुथार, मनीराम सुथार, बलवीर सिंह, हरदेव सिंह और मेरे चाचा मंगतराम, गुलाब सिंह थे. कच्ची पहली और पक्की पहली मैंने नहर के पार पंचायत घर में चलने वाले स्कूल में पढ़ी और दूसरी तीसरी व चौथी नहर के इस पार नया स्कूल बन जाने पर पढ़े, आजकल ये उच्च प्राथमिक पाठशाला है. बाद में मैं भानियावाला चला गया था.  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

YAADEN (22) यादें(२२)

पिताजी के साथ अक्सर महीने में एक बार तो बाल कटवाने या कोई कपडा बूट-जुराब वगेरा लाने को मेरा रायसिंहनगर जाना हो ही जाता था* उस ज़माने में तहसील से  
KUMAR BROTHERS PETROL PUMP तक सिर्फ पाँच-चार खाने के ढाबेनुमा होटल  थे. बाकि सब सुनसान था.  दीनानाथ कोहली, मेरे पिताजी के रिश्ते में मामा गुरदित्तामल  और  एक कश्मीरी ब्राह्मण सिख; ये तीन  खास ढाबे ठहरने व VEG/NONVEG खाने के थे.सब्जी बाज़ार  भी ढाबे थे.सब्जी मंडी चौराहे से उत्तर को पुलिस थाने की तरफ जानेवाली हरी हलवाई की मशहूर दुकान दक्षिण पश्चिम को खुलती थी ; (वर्तमान जगन्नाथ चिरंजीलाल कपडे वाले के सामनेमुझे पचास ग्राम बर्फी और आध पाव दही की लस्सी या दूध मिलना लाजिमी होता था. बड़े सारे तख़्तपोश पर भारी भरकम सरदार हरीराम का दोनों हाथो से मधानी चलाते, लोटे में दही के माथे जाने, लोहे के उलटे सुए से बर्फ तोड़ने के चटकारे, लोटे से बहार निकलते दही के छींटों की खट्टी-मीठी महक, और अंदर बैठे शहरी  व देहातियों की उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, डोगरी,कश्मीरी, सिन्धी की खिचड़ी बोली. गंगा-जमुनी तहज़ीब; वहां का सारा  मंज़र आज भी मेरे दिलो-दिमाग में जज़्ब है*

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 29 जनवरी 2012

YAADEN(21) यादें (२१)

मुझे धुंदली याद है गाँव के दुसरे लोगों के साथ मेरे चाचा बालकृष्ण जी व् मामा वेद प्रकाश जी भी लाणा (ऊँची किस्म की जलाऊ लकड़ी) लेने जाते थे. शाम को जाकर आधी रात तक उंठो पर लादकर लाते
थे. जरुरत लायक घर रखकर बाकि रायसिंहनगर बेचते थे.
राजस्थान नाहर (NOW IGNP) की खुदाई का काम शुरू होने पर मेरे छोटे मामा  सुभाषचन्द्र जी ने वहाँ काम किया था. उनकी CYCLE के सामने मिटटी के तेल की चिमनी लगी थी. हमारे घर संदूक में चाचा बालकृष्ण जी की पेंट कमीज़ थी. मेरी संभल में उन्होंने उसे कभी नहीं पहना. सफ़ेद-काली बिंदी वाली वो पेंट बाद में कटवा कर मैंने पहनी थी.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ