रविवार, 20 मई 2012

YAADEN(37) यादें (३७)

एक दिन मैंने सोचा; देखा जायकि चटनी कैसे बनती है; बाहर रसोई में पत्थर  की कुण्डी थी; मैंने उसमे एक कागज़ रखा और जोर से बट्टा मारा तो पत्थर की कुण्डी दो फाड़ हो गयी ; और मैं चुपके से खिसक गया;वो दोनों टुकड़े शायद अब भी नानुवाला हमारे धर पड़े हैं;  ज्ञान बावरी का लड़का सहीराम मेरा हम उम्र था; उसकी तिपहिया साईकिल हमारे घर सामान  के साथ ऊंटनी से उतरी; मैंने मान लिया , साईकिल मेरी ही है;बड़ी मुश्किल से मुझसे चोरी उसे पहुँचाया गया;
उषा के लिए पेंट और कमीज़ आयी ; मुझे सुन्दर लगी; पिताजी के साथ बनारसीदस अनिल कुमार मल्होत्रा की दुकान पर गया; बाशी (सुभाष शर्मा ) चाचाजी साथ थे; गले तक फौजियों वाली पेंट, सफ़ेद रंग की कमीज़ नाहर सिंह दर्जी ने सिलाई की थी, जिसे पहन कर मैं बहुत खुश रहता था; श्रीराम  के पिता का नाम रतनचंद  वह 37 NP का कोतवाल था, चक के मृत पशुओं लो वह ही उठाते थे; वह पढ़ा-लिखा था; उसका दादा बाबुराम था, यद्यपि छूआछूत काफी थी, रतनचंद और बाबुराम दोनों बाप-बेटों की  दुकान पर पिताजी के पास काफी आमदरफ्त थी; रतनचंद  अक्सर मुझे LAHUR UNIVERSITY और MATRIC  पढाई की बातें किया करता था; श्रीराम की माता धनवंती को मैं मौसी कहता था; बाबुराम बच्चों के नाखून पर चमेली का तेल लगा कर चोरी वगेरा बताता था; एक बार मेरे दायें हाथ के नाखून पर भी उसने प्रयोग किया था ; झाड़ू लगाओ, भिश्ती पानी छिड़के, चोर का पता बताओ, सामान बताओ, जगह बताओ, पर खूब कोशिश करने पर भी मैं कुछ नहीं बता सका; श्रीराम तीसरी तक मुझसे आगे था, चौथी से छटी तक बराबर रहे फिर वह पीछे हो गया; मेरे  देहरादून से वापसआने के बाद वह और करनसिंह राजपूत  विजयनगर सिपाही लग गए थे, बादमें  मैं जब लालगढ़ गिरदावर के पद पर था, एक दिन संयोगवश रायसिंहनगर से बस में पिछले दरवाज़े से चढ़ा;मैंने नानुवाला अड्डे पर उसे आगे -आगे जाते देखा; तो मिलने की इच्छा से दौड़कर पीछे से जाकर उसका कन्धा पकड़ा, उसने मुड कर; देखा और मुझे डांट दिया _"लाला ! बन्दे नू कोई तमीज़ होनी चाहीदी  है " 
मैं बहुत ही रुआंसा हो गया था, सोच रहा था की मैंने पद को भुलाकर दोस्ती को बरकरार रखा; पर उसने पुलसिये जैसा ही किया;
वह चुनावड थाने में था, वहीँ उसकी मौत हो गयी; उसका परिवार अब चुनावड ही रहता है;


जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 13 मई 2012

YAADEN(36) यादें (३६)

श्रीराम, विश्वनाथ fail होने पर चौथी में हमारे साथ हो गए. रोज़ शाम को पहाड़े बोलने होते थे; पौवा अद्धा पौना सवाया ड्योढ़ा से लेकर आगे तक. मेरी और गुरमेल की एक दुसरे से आगे निकलने की जिद में हम दोनों को 27 तक याद थे

हिंदी, गणित, सामाजिक ज्ञान,  सामान्य विज्ञान,  चित्रकला और उद्योग, शाम को उद्योग के रूप में प्रांगण की साफ-सफाई, पेड़ों को पानी, आदि करना होता था; शनिवार को आधी छुट्टी के बाद बाल-सभा होती थी; तेजासिंह आँखें बंद करके मुंह  ऊपर को करके एक हास्य-गीत सुनाता था - 

आप करदी  दो-  दो   गुत्तां; मैनू  कहिंदी टिंड  मना  !
आप जांदी सिल्मा वेखण;मैनू कहिंदी मुंडा खिढ़ा !! 
ਆਪ ਕਰਦੀ ਦੋ ਦੋ ਗੁੱਤਾਂ; ਮੈਨੂ ਕਹਿੰਦੀ ਟਿੰਡ ਮਨਾ !
ਆਪ ਜਾਂਦੀ ਸਿਲਾਮਾ ਵੈਸ਼ਨ; ਮੈਨੂ ਕਹਿੰਦੀ ਮੁੰਡਾ ਖਡਾ !!
गुरमेल सिंह का गीत बहुत ही भावपूर्ण था; उस समय नासमझ होने पर भी देश-विभाजन की त्रासदी का दर्द दिल में भर जाता था-

गड्डी भर के अमरसरों तोरी                   ਗੱਡੀ ਭਰ ਕੇ ਅਮ੍ਬਰ ਸਾਰੋੰ ਤੋਰੀ

इस के आगे के बोल मुझे याद नहीं ; पर उसका शाब्दिक अर्थ ये है क़ि; -

अमृतसर और लाहौर के बीच rail लाशों से भरी हुई आती-जाती थी* 

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 6 मई 2012

YAADEN(35) यादें (३५)

जवाहर लाल नेहरु की मौत के दूसरे दिन 28 .05 .1964 को अलवर से मेरे फूफा कस्तूरी लाल कोहली आए पता चला कि अलवर से रेवाड़ी सादुलपुर हनुमानगढ़ सूरतगढ़ से होकर सभी HOTEL और चाय के ढाबे बंद थे; वापस जाते वक़्त सूरत गाड़ी बदलने के दरम्यान उनका सामान चोरी हो गया था;

मिटटी का तेल 18 LITRE के कनस्तरों में आता था; सूरज छाप, हाथी छाप, चाबी छाप, बुड्ढा छाप 16 बीड़ी का BANDAL 6 नए पैसे, 24 बीड़ी का BANDAL 10 पैसे, सुभाषचंद्र बोस छाप माचिस, LAMP की सिगरेट, मशहूर थी;POST CARD 6 पैसे, अंतर्देशीय 10 पैसे, लिफाफा 15 पैसे व डाक रजिस्ट्री 25 पैसे की थी; 
खाली कनस्तरों से पिताजी ने सरदारा  सिंह तरखान से लगभग 8X8 वर्ग फुट का दरवाजा बनवाया था; मुझे आज भी वैसे ही नज़र आता है, 
सफेद दाढ़ी वाला सरदारा मिस्त्री, खेतुराम बिशम्बर दास गिद्दड़वाह वालों की नसवार सूँघता हुआ;   हमारी दुकान के सामने बैठा हुआ,हाथ में तेसा लेकर, बांसों का बड़ा सारा FRAME बना कर उसके दोनों तरफ कटे हुए कनस्तरों में लोहे की कीलें ठोक रहा है और मै गिलास में उसके लिए चाय लेकर जा रहा हूँ !   

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 29 अप्रैल 2012

YAADEN(34) यादें (३४)

सामान्यतः मै शरारती नहीं था किन्तु जिज्ञासु अवश्य था. पिताजी के साथ दुकान के छोटे मोटे कम करता था. लालटेन व चिमनी रोज़ साफ करना मेरा कम था. दुकान पर लालटेन टांगने के लिए छत से नीचे आधी उंचाई तक सूतली की रस्सी बाँधी रहती थी, जिसके नीचे लोहे का  कुंडा (S)लगा था. एक दिन पिताजी मुझे बिठा कर काम गए. मैं झूलने का विचार किया. थड़ी पर चढ़ कर कुंडा दायें गाल में डाला; और झूल गया. लोहे का कुंडा मेरे गाल के आर-पर हो गया. पता नहीं क्यों ? न तो मुझे दर्द हुआ, न ही डांट पड़ी.
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रविवार, 22 अप्रैल 2012

YAADEN (33) यादें (३३)

हमारे घर से उत्तर दिशा में रायसिखों के घर थे, करनैलसिंह जरनैल सिंह (केलि जेली) की दिवार हमारे साथ लगती थी, उस वक़्त कुंदन सिंह, लद्दासिंह (लद्दू) भी वहीँ रहते थे बाद में उन्होंने पश्चिम दिशा में मामा हरिराम कडवासरा से उत्तर में चिपता हुआ बनाया था; शमीर सिंह का परिवार कुछ दूर नहर के पास था; वे लोग शराब का धंधा करते थे, अक्सर पुलिस आती रहती थी; उत्तर-पश्चिम में नहर के दोनों ओर सरकनों में शराब की भट्ठियां बरामद होती रहती थी; ये शाह-मात और लुका-छिपी चलती ही रहती थी;करनैल की शादी की मुझे पूरी होश है; फाजिल्का से उनके काफी रिश्तेदार आये थे; ;उनमे से नारायण सिंह (नैणा) ने शराब पीकर काफी उत्पात किया था तलवारें भी चली थीं; कोई भागता हुआ दीवार फांद कर हमारे घर में से भाग रहा था कोई गालियाँ निकाल रहा था, कोई पकड़ने को पीछे दौड़ रहा था किसी के खून निकल रहा था, कोई तलवार लहरा रहा था; रोने-धोने पकड़ने-पकड़वाने गालियाँ निकालने छुड़ाने में औरतें भी शामिल थीं;  करनैल की पत्नी हमारे साथ घर परिवार जैसी घुल-मिल गई थी; मै उसे जग्गो भाभी कहता था; बाद में इन लोगों को RCP
में ज़मीनें ALOT हो गई थीं वे सरदारपुरा बीका (खिचियाँ) चले गए; करनैल सिंह का परिवार अभी भी हमारे पड़ोस में है;

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 15 अप्रैल 2012

YAADEN (32 )यादें (३२)

ग्राम पंचायत नानुवाला में 33 35 36 37 38  55 56 व 57 NP के चक थे, 1962 से 65 श्योकरण सहारण 38
NP (बल्लेवाला) सरपंच थे; जो मेरे मामाजी वेदप्रकाश के मित्र होने के नाते मेरे मामा ही थे; 1965 के चुनाव में उनके सामने हनुमान बिश्नोई 57NP थे; तकनीकी कारणों से श्योकरण जी का नामांकन ख़ारिज हो गया; कृष्णलाल सुथार 36NP (नानुवाला) हमारे उम्मीदवार हार गए; उस समय तक हनुमान जी की छवि अच्छी नहीं थी, सरपंच बनने के बाद उन्होंने शराब छोड़ दी; पुणे जाकर  ओशो रजनीश का शिष्यत्व में भगवे वस्त्र और नाम स्वामी आनंद  ऋषि ग्रहण कर लिया था* फिर 13 साल चुनाव नहीं हुए; 1978 में श्योकरण सहारण ने जसवीर सिंह 56NP को 46 मतों से हराया* तब तक मेरे ननिहाल का परिवार पूरी तरह भनियावाला/डोईवाला जा चुका था, मैं अपनी पढाई पूरी करके देहरादून से वापस आकर SBBJ रायसिंहनगर में अस्थाई काशिएर था;उससे पहले 1976 में NATIONAL FERTILIZERS LIMITED पानीपत में JUNIOR CHEMICAL OPERATOR के पद पर चयन होकर तूतीकोरन जाने का आदेश आ चूका था; जहाँ माता-पिता ने मुझे नहीं जाने दिया, फिर नहरी पटवारी के पद पर चयन होकर प्रशिक्षण पूर्ण कर चुका था; AIR INDIA में assistant flight purser की लिखित प्रतियोगिता में सफल हो चुका था;    और मेरी शादी भी हो चुकी थी*                    

  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 8 अप्रैल 2012

YAADEN (31) यादें (३१)

31दिसंबर 1964 को हम सब नए स्कूल के बड़े वले कमरे में डाली गई मिटटी की कुटी कर रहे थे उस दिन से आगे छुट्टियाँ होनी थीं; कृष्ण मंडा और नत्थू सुथार एक एक ईंट लेकर कुटी कर रहे थे, मैं तीसरी में था और वे दोनों पांचवी में ; मुझे अच्छी तरह याद है कमरे का उत्तर-पश्चिम कोना था, मैं हाथों से अर्ध गीली मिटटी थपक रहा था; शायद हो सकता है, कि उन्होंने मुझे टोका हो या न टोका हो ! मेरे दायें हाथ के थपके के ऊपर कृष्ण की ईंट पड़ गई;  मेरी कनिष्ठ का नाख़ून उतर गया और खून निकलने लगा; वे दोनों घबरा गए थे; मै न तो रोया न ही उनसे कोई शिकायत की; शाम को वे दोनों SKIN OINMENT की TUBE लकर घर आये और मुझे देकर गए;; मेरे माता-पिता ने भी इसे सामान्य घटना के रूप में लियाथा*  वैसे भी कृष्ण के पिता लूणा जी मंडा सभ्रांत व शांत प्रकृति के थे हालाँकि उसके  दादा हमीरा जी और चाचा शंकर की छवि उतनी अच्छी नहीं थी; नत्थू के पिता हनुमान जी सुथार की मेरे पिताजी के साथ अच्छी उठ-बैठ थी*    दायें हाथ की कनिष्ठा का नाखून आज भी उस घटना का गवाह है*            
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 1 अप्रैल 2012

YAADEN (30) यादें (३०)

कक्षा दो में हिंदी की किताब में एक पाठ था सुजाता की खीर.
महात्मा बुद्ध को सुजाता की खीर खाकर बोध हुआ कि, दुःख का कारण क्या है? इस अंतिम पंक्ति के साथ पाठ पूरा हो गया था. मैं बहुत बेचैन हो गया था, उस कारण को जानने को. ये बेचैनी चार साल चली. कक्षा छह
में आकर मैंने पड़ा कि, दुःख का कारण है; इच्छा. उसके बाद ये सिद्धांत मै याद रखने का प्रयत्न करता आया हूँ !
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

शनिवार, 24 मार्च 2012

YAADEN (29) यादें (२९)

पिताजी अक्सर दुकान का हिसाब मुझसे करवाते थे. इसलिए मै गणित में
बहुत होशियार था. इसके अलावा रिश्तेदारों को हिंदी के पत्र लिखना और पढना भी मेरे जुम्मे था. इ बार धनीराम जी ने अपनी बहन को देवबंद Money order भेजना था मैंने money order form भरना शुरू किया उसमे उपार लिखा था - पाने वाले का नाम मैंने उसमे भर दिया - धनीराम मार्फ़त जेठाराम पनवाड़ी सब्जी बाज़ार रायसिंहनगर; फिर नीचे लिखा था भेजने वाले का नाम तो मैं चक्कर खा गया की दोनों जगह भेजने वाले का पता नहीं हो सकता form के छपे में खराबी हो सकती है; इसलिए मैंने दुसरे स्थान पर देवबंद का पता लिख दिया दुसरे दिन रायसिंहनगर से लौट कर पिताजी ने मुझे डांटा की ऊपर प्राप्तकर्ता का और नीचे भेजने वाले का पता लिखना चाहिए था; मैं समझ नहीं पा रहा था की फिर डाक खाने वालों ने form के ऊपर पाने वाले का पता क्यों छापा है ? (पंजाबी में पानेवाला के अर्थ है - भेजने वाला)
उस वक़्त moneyorder
form दो नए पैसे का और money order का commission पचास पैसे प्रति दस रुपये था*
   
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      

रविवार, 18 मार्च 2012

YAADEN(28) यादें (२८)

हमारे गुरूजी जगरूप सिंह जी लापरवाह किस्म के थे* हम सभी विद्यार्थियों को अपनी-अपनी बारी से स्कूल में  झाड़ू सफाई करनी होती थी; एक सुबह जब निरीक्षक आए, कूड़ा दरवाजे के सामने पड़ा था; गुरूजी उस समय तक नहीं आए थे. वर्ष 1978-82 के दौरान मैं नहरी पटवारी था, वे 5 BLM में पदस्थापित थे* एक दिन बस में मैने उन्हें पहचान लिया और चरण-स्पर्श किया. भैराराम जी अनुशासन-प्रिय थे और सख्त-सजा 
 हाथ ऊपर करके खड़ा करना, डंडा या मुर्गा बनाना थी. सेवकसिंह जी व भैराराम जी की लिखावट सुन्दर थी. सेवकसिंह जी संधू का ननिहाल हमारे गाँव में ही था उनको बोलचाल में सुखदेव कहते थे. बाद में लगभग 1985 में मैं निरीक्षक था, और वे पंचायत समिति गंगानगर में थे*
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 11 मार्च 2012

YAADEN(27) यादें (२७)

गाँव में आने जाने वाले साधू संत और यात्री व्यापारियों के प्रति विश्वास भाव था. उनके ठहरने खाने की व्यवस्थाएं की जाती थी. हमारे घर
भी यदा-कदा साधू-महात्मा या व्यापारी रुकते रहते थे. कथा प्रसंग भी
होते थे. अमृतसर से दो वंजारे पांच-चार महीने में अक्सर फेरी
लगाने आते थे उन में से एक हमारे घर ही रुकते थे. और सुबह जाते
वक़्त मेरी छोटी बहनों सरोज सुशीला व शशि को चूडियाँ देते थे.
गायों के झुण्ड लेकर मिएँ आते थे. हम उनसे 8/- रूपये सेर मक्खन
लेकर 12 / रुपये किलो घी बेचते थे उस वक़्त चना 40 पैसे व गेहूं 50 पैसे किलो खरीदते थे ! 
-- जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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सोमवार, 5 मार्च 2012

YAADEN(26) यादें (२६)

हमारे गुरूजी ओमप्रकाश जी सरल और सहयोगी स्वाभाव के थे. तीसरी कक्षा में पहली बार लिखित परीक्षा होने से मैं उत्साहित था.प्रश्न था, "कृष्ण के मामा का नाम क्या था?" मैने लिखा 'कंस'. बाद में उन्होंने समझाया लिखना चाहिए,
कृष्ण के मामा का नाम कंस था. शरद पुर्मिमा पर वे हमें नानुवाला कोठी लेकर गए. थाली चम्मच, घर से लेकर गए. वहां खीर बनाई
नहर में नहाये, फिर खीर खाकर वापस आए;
 मेरी चम्मच नहाने धोने के दौरान गुम गई. 
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

YAADEN(25) यादें(२५)

मेरे बड़े मामा वेदप्रकाश जी की सरपंच श्योकरण सहारण,  हरी राम कडवासरा तथा दीना नाथ आनंद के साथ दोस्ती थी. इस  नाते मैं इनको मामा ही कहता था. नानुवाला गाँव बसाने  वाले  चौधरी नानुराम के पुत्र श्री श्योकरण गोदारा मेरे स्वर्गीय नाना हरिचंद सेठी के मित्र बन गए थे, इस नाते मैं उनको नाना नानी व् उनके पुत्रो मनीराम गोदारा, महेंद्र गोदारा व् बलराम गोदारा को मामा कहता था. वे बहुत बाद में मेरे नौकरी लगने के आस पास मृत्यु पर्यंत  तक भी मुझसे दौहित्र जैसा ही व्यवहार करते रहे.  सरपंच श्योकरण सहारण मेरे मामाजी को अपने गाँव 38NP ले
गए, मेरे मामाजी ने वहां दुकान की, तब मैं कई बार वहां जाकर रहाउसके बाद बड़े मामाजी बड़े मौसाजी के पास डोईवाला (देहरादून) चले गए उन्होंने भानियावाला में दुकान की.
02.07.1964 वृहस्पतिवार  को मेरे बड़े मामाजी की शादी हुई. मैं पिताजी के साथ जाकर बनारसीदास अनिल कुमार मल्होत्रा की दुकान से कपडे खरीदने गया था. 101/ रुपये के कपडे आये थे. शाम को आठ बजे रेल से जाना था. रायसिंह नगर में दादा गुरादित्तामल के होटल में सब इकट्ठे हुए. छोटे मामा सुभाषचन्द्र जी संदूक उठाने लगे तो उसका तीखा कोने मेरी छोटी बहन सरोज के सिर में लगा और वह बेहोश हो गई . मुश्किल से उसे होश आया. मीटरलाइन की गाड़ी से गंगानगर, हनुमानगढ़ और बठिंडा. आगे बड़ी गाड़ी से अम्बाला, वहा से बदलकर  सहारनपुर. आगे बस पर देहरादून और दूसरी बस पर लच्छीवाला . अपने होश में ये मेरी पहली रेल और बस यात्रा थी. माँ ने बताया की उससे पहले भी वे मुझे लेकर देहरादून गए थे.
मामाजी की शादी में मुझे कई प्रकार के अनुभब हुए. लच्छी वाला में मौसा जी और उनकेभाई लकड़ी की छत वाले दो मंजिला मकानों में रहते थे. बीच में लकड़ी की ही सीढ़ी थी. लगभग हर समय बरसात होती रहती थी. मेरा हम उम्र मौसेर गौरीश्याम उर्फ़ बब्बू मुझे कन्धों पर बिठा कर घूम रहा था. मैंने उसे कहा - अगर मुझे गिराओ तो पक्की जगह पर ही गिरना, कीचड में गिरने से मेरे कपडे ख़राब हो जायंगे. बाद में रिश्तेदारों में  मेरे कथन की खूब चर्चा हुई, उस समय मैं दूसरी पास करके तीसरी में हो चूका था.
उत्तर प्रदेश परिवहन की पीले रंग की बस को हमने झंडियों से सजाया, और बारात प्रेमनगर रवाना हुई. बारात दुसरे दिन दोपहर के खाने तक रुकी. दूर के एक रिश्तेदार डाक्टर के पास
TORCH में छोटा सा पंखा लगा हुआ था, जिससे लग्न मंडप में वो मामाजी को हवा कर रहे थे. दहेज़ में TABLE  FAN  और  TABLE  LAMP  भी थे. इन दोनों चीजों को लेकर मेरे मन में ये विश्वास था की इन दोनों के तार आपस में जोड़ देने से दोनों चलने लगेंगे, सबकी नज़रों से बच कर मैंने थोडा बहुत प्रयास किया भी.
और मैं बड़ा प्रफुल्लित होकर नानुवाला लौटा.  कुछ समय बाद मेरे मझले मामा केदारनाथ जी बड़ी मामी जी निर्मल रानी को नानुवाला लेकर आये. उनको राय सिंह नगर से जीप में लेकर आये, हमने घर में LAUD SPEAKAR लगाया, और उस समय मुझे पंख लगे हुए थे.
     
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

YAADEN (24) यादें (24)

तेजा सिंह, गुरमेल सिंह व मेरी मित्रता ठीक थी. उसका एक कारण ये भी थे कि हम तीनो ही पंजाबी हैं; और हमारे परिवारों में भी मिलना जुलना था, हम तीनो के घर स्कूल से लगभग उत्तर दिशा में थे; हालाँकि तेजसिंह का घर नहर पार उत्तर पूर्व कोने पर था और गुरमेल का नहर के किनारे, उस समय हम लगभग नासमझ थे. और एक दुसरे पर भरोसा करते थे; एक दिन हम तीनों साथ-साथ स्कूल से घर रवाना हुए थे; ठाकर सिंह (कैलाश, मोहन सिंह, कर्ण सिंह, नरसिंह, सोमा सुमित्रा) के घर से मुझे अपने घर पश्चिम को मुड़ना था; और उन दोनों को सीधा उत्तर नहर कि तरफ जाना था; तेजा ने मुझे बातों में लगाये रखा, और अचानक गुरमेल ने मेरी पीठ पर मुक्का मारा, और दोनों एकदम से अपने घरों को भाग गए; मेरे भोले मन को, उस दिन पहली बार आस्तीन के सांप का अहसास हुआ था#
पर मैंने न तो शिकायत की; और न ही मित्रता छोड़ी* 

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

YAADEN (23) यादें (२३)

मेरे साथ कक्षा में गुरमेल सिंह, तेजा सिंह, मेरी दोनों मौसियाँ सोमा व कमला हम पांच सहपाठी थे;  हमारे से पीछे मोहन सिंह, श्याम सिंह, जसवीर सिंह, महेंद्र सिंह (राजपूत), सुल्तान सुथार, काशी सुथार, महेंद्रसिंह (छोटा मिंदा), किरना, पदमा और मेरी बुआ सत्या देवी थीं. हमारे से आगे महेंद्र सिंह (बड़ा मिंदा), मदन गोदारा, मेरे चाचा मदन लाल,  श्रीराम, कैलाश देवी, गुड्डी कौर. विश्वनाथ और उसकी बहन बिमला  थीं; उससे आगे कृष्ण मंडा, नत्थू राम सुथार, मनीराम सुथार, बलवीर सिंह, हरदेव सिंह और मेरे चाचा मंगतराम, गुलाब सिंह थे. कच्ची पहली और पक्की पहली मैंने नहर के पार पंचायत घर में चलने वाले स्कूल में पढ़ी और दूसरी तीसरी व चौथी नहर के इस पार नया स्कूल बन जाने पर पढ़े, आजकल ये उच्च प्राथमिक पाठशाला है. बाद में मैं भानियावाला चला गया था.  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

YAADEN (22) यादें(२२)

पिताजी के साथ अक्सर महीने में एक बार तो बाल कटवाने या कोई कपडा बूट-जुराब वगेरा लाने को मेरा रायसिंहनगर जाना हो ही जाता था* उस ज़माने में तहसील से  
KUMAR BROTHERS PETROL PUMP तक सिर्फ पाँच-चार खाने के ढाबेनुमा होटल  थे. बाकि सब सुनसान था.  दीनानाथ कोहली, मेरे पिताजी के रिश्ते में मामा गुरदित्तामल  और  एक कश्मीरी ब्राह्मण सिख; ये तीन  खास ढाबे ठहरने व VEG/NONVEG खाने के थे.सब्जी बाज़ार  भी ढाबे थे.सब्जी मंडी चौराहे से उत्तर को पुलिस थाने की तरफ जानेवाली हरी हलवाई की मशहूर दुकान दक्षिण पश्चिम को खुलती थी ; (वर्तमान जगन्नाथ चिरंजीलाल कपडे वाले के सामनेमुझे पचास ग्राम बर्फी और आध पाव दही की लस्सी या दूध मिलना लाजिमी होता था. बड़े सारे तख़्तपोश पर भारी भरकम सरदार हरीराम का दोनों हाथो से मधानी चलाते, लोटे में दही के माथे जाने, लोहे के उलटे सुए से बर्फ तोड़ने के चटकारे, लोटे से बहार निकलते दही के छींटों की खट्टी-मीठी महक, और अंदर बैठे शहरी  व देहातियों की उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, डोगरी,कश्मीरी, सिन्धी की खिचड़ी बोली. गंगा-जमुनी तहज़ीब; वहां का सारा  मंज़र आज भी मेरे दिलो-दिमाग में जज़्ब है*

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 29 जनवरी 2012

YAADEN(21) यादें (२१)

मुझे धुंदली याद है गाँव के दुसरे लोगों के साथ मेरे चाचा बालकृष्ण जी व् मामा वेद प्रकाश जी भी लाणा (ऊँची किस्म की जलाऊ लकड़ी) लेने जाते थे. शाम को जाकर आधी रात तक उंठो पर लादकर लाते
थे. जरुरत लायक घर रखकर बाकि रायसिंहनगर बेचते थे.
राजस्थान नाहर (NOW IGNP) की खुदाई का काम शुरू होने पर मेरे छोटे मामा  सुभाषचन्द्र जी ने वहाँ काम किया था. उनकी CYCLE के सामने मिटटी के तेल की चिमनी लगी थी. हमारे घर संदूक में चाचा बालकृष्ण जी की पेंट कमीज़ थी. मेरी संभल में उन्होंने उसे कभी नहीं पहना. सफ़ेद-काली बिंदी वाली वो पेंट बाद में कटवा कर मैंने पहनी थी.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      

रविवार, 22 जनवरी 2012

YAADEN (20) यादें(20)

मुझे तो याद नहीं, पर बलवीर सिंह की चर्चा अक्सर गाँव में चलती थी.शायद वो हमारी प्राथमिक पाठशाला के पहले अध्यापक थे हमारे घरों में उनका नाम सम्मान से लिया जाता था.HOATAA HAI KI   
 कच्ची पहली और पक्की पहली उन्होंने मुझे पढाया हो. लगभग पचास बरस बीतने पर भी, अक्सर मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा उमड़ आती है. हमारे घर में दुकान के पीछे वाले कमरे में थोड़े बहुत खेती के छोटे औजार रहते थे मोटाराम नायक हमारे खेत का काम करता था; वह उसमे ही अपना भी थोडा-बहुत सामान रखता था* कच्ची पहली का कायदा और उसके पीछे लिखी दो बिल्लियों की कहानी भी मुझे सुनाया करता था मेरे चाचाजी व माँ भी मुझे कायदा पढाया करते थे माँ ने बताया था कि स्कूल में मेरा दाखिला मझले मामाजी ने कराया था.बाद में ओमप्रकाश जी जगरूप सिंह जी, सेवक सिंह संधू, भैराराम माकड़ के नाम मुझे याद है. सेवकसिंह जी व भैराराम जी की लिखावट से मै प्रभावित था. ओमप्रकाशजी सहयोगी  प्रकृति  के थे* उसके बाद मैं भानियावाला चला गया था*
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 15 जनवरी 2012

YAADEN(19) यादें(१9)

शायद मैं SCHOOL नहीं जाने लगा था उस वक़्त रायसिंहनगर का KUMAR BROTHERS PETROL PUMP नहीं था NEW LIGHT CINEMA के आस-पास भी सब खली ज़मीं थी दक्षिण दिशा में PS नहर से वर्तमान अनूपगढ़ ROAD, RAILWAY LINE और श्रीविजयनगर की तरफ बीच की सारी जगह में  ईंट भट्ठों के बड़े खदान थे और ये दोनों सड़कें नहीं थी. मेरी संभल में वहां ईंट भट्ठे चला करते थे. शहर से नानुवाला की तरफ दक्षिण को निकालने पर सबसे  आखिर में बाल की चाय की दुकान थी एक बार मैं पिताजी और बड़े मामाजी के साथ था. रायसिंहनगर  से लौटते समय बाल के ढाबे पर चाय पीने के दौरान बड़े मामाजी से कांच का गिलास टूट गया इस पर बाल ने खूब हंगामा किया पिताजी बार-बार बीच-बचाव करते हुए उसे समझा रहे थे की तुम अपने गिलास के पैसे ले लो*
बाल का ढाबा KUMAR BROTHERS PETROL PUMP से नहर की पुलिया पार करते ही दक्षिण पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख है* लगभग १९८० तक उसके सामने अजायबसिंह की चक्की थी*

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

YAADEN (18)यादें (१८)

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लोहड़ी का त्यौहार आने पर छोटे- बड़े बच्चे घर-घर से लोहड़ी मांगते थे - 
सुन्द्रिये- मुंदरिये हो ! ਸੁੰਦ੍ਰਿਏ  ਮੁੰਦਰੀਏ  ਹੋ !
तेरा कौन वचारा हो !! ਤੇਰਾ ਕੌਣ ਵਚਾਰਾ  ਹੋ !!
दुल्ला भट्ठी वाला हो !!! ਦੁੱਲਾ ਭਟ੍ਠੀ  ਵਾਲਾ ਹੋ !!!
दूल्ले धी विहाई हो !!!! ਦੁੱਲੇ ਧੀ ਵਿਹਾਈ  ਹੋ !!!!
प्राप्त लकड़ियों और मूंगफली आदि से गली में लोहड़ी जलाई जाती थी घर-घर में सब अपने -अपने पूर्वज-पितरों को ध्यान करके घर के सभी सदस्य अपने- अपने लकडियो के मुट्ठे अग्नि में डालते थे. हम बच्चों के लिए लोहड़ी की अग्नि में सुए गर्म करके मूंगफली, गज्जक, रेवाड़ी, पतासे, खोपरा, छुहारे, चीनी के मीठे व् रंग-बिरंगे खिलोने व कभी कभार बर्फी या सख्त किस्म की मिठाई पिरो कर हांर बनाये जाते थे, दुसरे दिन सुबह नहा कर नए कपडे व हर पहन कर सब घरों में जाकर बड़ों के चरण- स्पर्श करने होते थे. किसी बच्चे या दुल्हन की पहली लोहड़ी होने पर विशेष कर हार बनाये जाते थे. इस बार मैं अपनी दोनों बेटियों की शादी के बाद पहली लोहड़ी होने पर वैसे ही हांर बनाना चाहता था मगर 10-11 जनवरी की रात मेरे पिताजी की  चाची  (श्रीमती रामप्यारी) का इन्तेकाल हो जाने के कारन हमारे  सूतक लग  जाने से लोहड़ी नहीं जलानी है ! 
सूर्य देव के दक्षिणायन होने का त्यौहार अग्नि में नई लकड़ी,  नए चावल, नए तिल और गुड समर्पित करके; हम भारतीय उस ऊर्जा दाता भगवन भास्कर के, अपने इस उत्तरी गोलार्ध में लौटने पर; उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं ; इसी दिन के इंतज़ार में भीष्म पितामह 6 मास तक बाणों की शैया पर पड़े रहे थे ! 
सभी को सूर्य देव अपना बल और तेज प्रदान करें, इसी प्रार्थना के साथ-
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 8 जनवरी 2012

YAADEN(17) यादें(१७)

मेरे ननिहाल से पश्चिम व दक्षिण वाले बिश्नोई सुथार जाट बावरियों को मैं मामा /मामी नाना /नानी और हमारे घर से पूर्व पश्चिम व उत्तर को बसने वाले बावरी जटसिख रायसिख व रामदासियों  को चाचा/चाची कहता था चाचा ओमप्रकाश जी की शादी की मुझे पूरी याद है उससे पहले
हालत बिगड़ चुके थे शादी में हमारी शिरकत काफी कम थी अगरचे
जाती तौर पर हमारे घर उनका पूरा आना जाना था और मामा दीनानाथ आनंद के साथ वो खाना खाने भी आये थे रायसिंहनगर से डाक्टर मेघराज,दीनानाथ कोहली, सीताराम साबुनवाले व हुकमी उस शादी में आये थे. मुझे याद है कुतर की मशीन के हत्थे पर रखकर हुकमी ने गैस(PERTOMAX) जलाया और ड्योढ़ी के नीचे लटके सरिये में टांगा था; उस दूधिया तेज रौशनी में हम सब बच्चे खेल रहे थे !   
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      
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रविवार, 1 जनवरी 2012

YAADEN (16) यादें (१६)

होलाष्टक से पहले ही चंग की थाप सुनने लगती थी शाम से देर रात
तक बावरियो के मोहल्ले में धमाल मचता वहां देहाती किस्म के स्वांग लोगों के बारे में बनाये जाते थे एक दो बार मेरे पिताजी और चाचाजी के बारे में भी स्वांग बने थे पर इनका बुरा न मानकर हंसी ठट्ठे में लेते थे होली दाह की सिर्फ बातें सुनी थी झगडे के वहम से मुझे वहां जाने की मनाही थी ये इत्तेफाक है; की मैं आज तक नानुवाला की होली-दाह में शिरकत नहीं हुआ.
होली के दिन सारे गाँव में चंग काफिला सारे घरों में घूमता गता-बजाता 
था बाद में सब एक दूसरे से मिलने और राम-राम करने एक दूसरे के घरों में जाते थे. 
अंग्रेजी नव-वर्ष २०१२ की शुभकामनाएं !Photo: Pichkari ki Dhar,
Gulal ki bauchhar,
Apno ka pyar,
Yahi hai yaaron holi ka tyohar.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 25 दिसंबर 2011

YAADEN(15) यादें(१५)

नहर से खेतों में लगने वाले पानी के लिए पंचायती तौर पर हिसाब रखा जाता था इसके लिए मीराब चुना जाता था * उसे अमूमन दो पहर(छः घंटे ) पानी हर बारी का दिया जाता था* पूरी बारी में एक मुरब्बे को  पाँच या छः घंटे, नहर में पानी कम होने पर दूनी बारी, और नहर में पानी झारा होने पर एक बीघा भरने तक एक घंटा माना जाता था. पानी एक नाके  से दुसरे नाके तक दूर पानी ले जाने वाले काश्तकार भराई के रूप में एक मुरब्बा दूरी तक आधा घंटा भारी और लगते पानी के बाद पीछे किसी खेत में पानी तोड़ने पर निकाल के रूप में पाँच मिनट की कटाई.लोग अपनी ज़रुरत के मुताबिक एक दुसरे से पानी उधार लेन-देन करें या अपने ही किसी एक खेत का पानी किसी दुसरे खेत में लगावें सब हिसाब मीराब ही रखता था. एक बार हमारी दुकान के आगे कुछ लोग पानी के लेन-देन की चर्चा कर रहे थे, बातचीत के दरम्यान  बड़े मामा जी ने मीराब को कहा कि हम पहले अपने खेत में पानी लगा कर बाद में भरा भराया खाला बलराम गोदारा को दे देंगे.
और मैं सोच रहा था, कि पानी खेत में लगा लेने के बाद  ख़ाला भरा हुआ तो नहीं रहेगा; मामाजी ने उनके साथ चालाकी कर ली है.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 18 दिसंबर 2011

YAADEN (14) यादें (१४)

शायद  मैं  5 या  6 साल  का  था . चाचाजी  श्री  बाल कृष्ण   और  बड़े  मामाजी  स्वर्गीय  श्री  वेद प्रकाश  ने  सिनेमा  देखने  रायसिंहनगर जाने का कार्यक्रम बनाया. मैं इनके साथ हो गया. मुझसे पीछा छुड़ाना मुश्किल होगया था. हम तीनो घर से चल कर नहर तक पहुँच गए. उस दिन नहर सूखी थी. पश्चिमी किनारे वाली दो बेरियों के नीचे हम तीनो खड़े थे. मैं नहर पार करने की जिद कर रहा था. चाचाजी ने चाल चली और मुझे कहा घर जाकर भरजाई (मेरी  माता) को कहो -चाय बनाओ, चाय बनाओ फिर चाय पीकर चलेंगे मैं वापस घर आकर माँ को  चाय बनाने के लिए कहने लगा तो माँ ने हँसकर मुझे गले लगा लिया और मैं समझ गया था की वे मुझे बेवकूफ बनाकर सिनेमा देखने चले गए. 
इस पहली ज्ञात बेवकूफी की याद अक्सर गुदगुदा जाती है.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

YAADEN (13) यादें (१३)

तक़रीबन स्कूल बनाने के वक़्त ही हमारे घरो के नोजवानो ने मंदिर बनाने का बीड़ा उठाया मेरे चाचा मामा उनके संगी साथी व हम उम्र इनमें बड़ी उम्र के ठाकुर बलवंत  सिंह जी को प्रधान बनाया गया नहर से मशरक  व  स्कुल  से  जनूब में बनाया गया दुसरे तबके के लोग भी कुछ हद तक इसमें शामिल थे. रोजाना सुबह-शाम के अलावा मंगल के रोज़ शाम को खास कीर्तन भजन में देर तक औरतें
बच्चे शिरकत करते थे* शुरू में पंडित पुरुषोत्तमदास जी पूजा पथ करते थे उनके दिल्ली चले जाने के बाद ठाकुर बलवंत सिंह जी, मनोहरलाल जी, बलदेव सिंह जी, जीवनसिंह जी, भी ईद जिम्मेवारी को निभाते रहे. जन्माष्टमी सालाना ज़लसे के तोर मनाई जाती थी महिना  भर  पहले मिटटी
गोबर की लिपाई औरते  शुरू  कर देती थीं
आदमी  कली व साफ सफाई करते कम उम्र  वाले झंडिया बनाते व लगते रायसिंहनगर से  PETROMAX व  केले के पेड़ लाये जाते पढ़ाकू बच्चे दीवारों पर अन्दर बहार मज़हबी व अदबी लिखावटें व चित्रकारी करते औरते मिलकर माम्दस्ते में मसाले कूटती भजन गाती और पंजीरी बनाती*
घरो से दरिया चादरें दुपट्टे व साडियां लाकर कृष्णजी का पलना सजाया जाता
तालीम याफ्ता व पदाकु जवान LOUDSPEAKAR मंगाया जाता शाम को सबसे पहले 
"आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ; झांकी हिंदुस्तान की !
इस मिटटी से तिलक करो; यह धरती है बलिदान की!!" 
बजाया जाता था*
रात को कंस और कृष्ण कीकथा होती आधी रात को चंद्रमा आने पर अर्घ्य देकर प्रसाद व चरणामृत बाँटते सरे बच्चे बहार खेलते सब तबकों के लोग कमोबेश उस
रात शिरकत करते थे --
दिवाली  पर  हर  घर से मंदिर व नहर  /डिग्गी पर एक दिया जलाया जाता था-
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 4 दिसंबर 2011

YAADEN 12 यादें (१२)

मैं  SCHOOL कब जाने लगा? मुझे तो याद नहीं. माँ बताया करती थी की,
मैं SCHOOL जाने की जिद किया करता था. मामा केदारनाथजी ने मुझे भर्ती कराया था. मुझे याद है, नहर के पार पंचायत घर में SCHOOL लगता था. कई बार हम नहर के पास बबूल के पेड़ के नीचे बैठते थे.
बोरी घर से लेकर जाते थे. कभी कभी टाट-पट्टियाँ आ जाती थीं. आधी छुट्टी में उबला हुआ. गिलास घर से लेकर जाते थे. चौथी-पांचवी वाले ये काम करते थे. कुछ बच्चे फीका दूध पीते थे. कुछ घर से गुड, शक्कर या देसी खांड लाते थे. मेरे गिलास में मोटी दानेदार चीनी देखकर उनको अचरज होता था. वर्तमान स्थान पर सरपंच श्योकरण सहारण ने नीव रखी थी.  हम सब बच्चे प्रार्थना की मुद्रा में  हाथ जोड़े नहर से लकड़ी का पुल पार करके आये थे और हमें पातासों का प्रसाद  मिला था. सारा दृश्य आज भी मेरी आँखों में तैरता है. इस प्राथमिक विद्यालय से कई यादें जुडी हैं. एक हाल, एक सामान्य कमरा और एक छोटी रसोइनुमा कार्यालय और बड़ा सा खेल का मैदान बिना चारदीवारी. अब ये उच्च प्राथमिक है*
 जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ