रविवार, 19 फ़रवरी 2012

YAADEN (24) यादें (24)

तेजा सिंह, गुरमेल सिंह व मेरी मित्रता ठीक थी. उसका एक कारण ये भी थे कि हम तीनो ही पंजाबी हैं; और हमारे परिवारों में भी मिलना जुलना था, हम तीनो के घर स्कूल से लगभग उत्तर दिशा में थे; हालाँकि तेजसिंह का घर नहर पार उत्तर पूर्व कोने पर था और गुरमेल का नहर के किनारे, उस समय हम लगभग नासमझ थे. और एक दुसरे पर भरोसा करते थे; एक दिन हम तीनों साथ-साथ स्कूल से घर रवाना हुए थे; ठाकर सिंह (कैलाश, मोहन सिंह, कर्ण सिंह, नरसिंह, सोमा सुमित्रा) के घर से मुझे अपने घर पश्चिम को मुड़ना था; और उन दोनों को सीधा उत्तर नहर कि तरफ जाना था; तेजा ने मुझे बातों में लगाये रखा, और अचानक गुरमेल ने मेरी पीठ पर मुक्का मारा, और दोनों एकदम से अपने घरों को भाग गए; मेरे भोले मन को, उस दिन पहली बार आस्तीन के सांप का अहसास हुआ था#
पर मैंने न तो शिकायत की; और न ही मित्रता छोड़ी* 

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

YAADEN (23) यादें (२३)

मेरे साथ कक्षा में गुरमेल सिंह, तेजा सिंह, मेरी दोनों मौसियाँ सोमा व कमला हम पांच सहपाठी थे;  हमारे से पीछे मोहन सिंह, श्याम सिंह, जसवीर सिंह, महेंद्र सिंह (राजपूत), सुल्तान सुथार, काशी सुथार, महेंद्रसिंह (छोटा मिंदा), किरना, पदमा और मेरी बुआ सत्या देवी थीं. हमारे से आगे महेंद्र सिंह (बड़ा मिंदा), मदन गोदारा, मेरे चाचा मदन लाल,  श्रीराम, कैलाश देवी, गुड्डी कौर. विश्वनाथ और उसकी बहन बिमला  थीं; उससे आगे कृष्ण मंडा, नत्थू राम सुथार, मनीराम सुथार, बलवीर सिंह, हरदेव सिंह और मेरे चाचा मंगतराम, गुलाब सिंह थे. कच्ची पहली और पक्की पहली मैंने नहर के पार पंचायत घर में चलने वाले स्कूल में पढ़ी और दूसरी तीसरी व चौथी नहर के इस पार नया स्कूल बन जाने पर पढ़े, आजकल ये उच्च प्राथमिक पाठशाला है. बाद में मैं भानियावाला चला गया था.  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

YAADEN (22) यादें(२२)

पिताजी के साथ अक्सर महीने में एक बार तो बाल कटवाने या कोई कपडा बूट-जुराब वगेरा लाने को मेरा रायसिंहनगर जाना हो ही जाता था* उस ज़माने में तहसील से  
KUMAR BROTHERS PETROL PUMP तक सिर्फ पाँच-चार खाने के ढाबेनुमा होटल  थे. बाकि सब सुनसान था.  दीनानाथ कोहली, मेरे पिताजी के रिश्ते में मामा गुरदित्तामल  और  एक कश्मीरी ब्राह्मण सिख; ये तीन  खास ढाबे ठहरने व VEG/NONVEG खाने के थे.सब्जी बाज़ार  भी ढाबे थे.सब्जी मंडी चौराहे से उत्तर को पुलिस थाने की तरफ जानेवाली हरी हलवाई की मशहूर दुकान दक्षिण पश्चिम को खुलती थी ; (वर्तमान जगन्नाथ चिरंजीलाल कपडे वाले के सामनेमुझे पचास ग्राम बर्फी और आध पाव दही की लस्सी या दूध मिलना लाजिमी होता था. बड़े सारे तख़्तपोश पर भारी भरकम सरदार हरीराम का दोनों हाथो से मधानी चलाते, लोटे में दही के माथे जाने, लोहे के उलटे सुए से बर्फ तोड़ने के चटकारे, लोटे से बहार निकलते दही के छींटों की खट्टी-मीठी महक, और अंदर बैठे शहरी  व देहातियों की उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, डोगरी,कश्मीरी, सिन्धी की खिचड़ी बोली. गंगा-जमुनी तहज़ीब; वहां का सारा  मंज़र आज भी मेरे दिलो-दिमाग में जज़्ब है*

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

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रविवार, 29 जनवरी 2012

YAADEN(21) यादें (२१)

मुझे धुंदली याद है गाँव के दुसरे लोगों के साथ मेरे चाचा बालकृष्ण जी व् मामा वेद प्रकाश जी भी लाणा (ऊँची किस्म की जलाऊ लकड़ी) लेने जाते थे. शाम को जाकर आधी रात तक उंठो पर लादकर लाते
थे. जरुरत लायक घर रखकर बाकि रायसिंहनगर बेचते थे.
राजस्थान नाहर (NOW IGNP) की खुदाई का काम शुरू होने पर मेरे छोटे मामा  सुभाषचन्द्र जी ने वहाँ काम किया था. उनकी CYCLE के सामने मिटटी के तेल की चिमनी लगी थी. हमारे घर संदूक में चाचा बालकृष्ण जी की पेंट कमीज़ थी. मेरी संभल में उन्होंने उसे कभी नहीं पहना. सफ़ेद-काली बिंदी वाली वो पेंट बाद में कटवा कर मैंने पहनी थी.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      

रविवार, 22 जनवरी 2012

YAADEN (20) यादें(20)

मुझे तो याद नहीं, पर बलवीर सिंह की चर्चा अक्सर गाँव में चलती थी.शायद वो हमारी प्राथमिक पाठशाला के पहले अध्यापक थे हमारे घरों में उनका नाम सम्मान से लिया जाता था.HOATAA HAI KI   
 कच्ची पहली और पक्की पहली उन्होंने मुझे पढाया हो. लगभग पचास बरस बीतने पर भी, अक्सर मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा उमड़ आती है. हमारे घर में दुकान के पीछे वाले कमरे में थोड़े बहुत खेती के छोटे औजार रहते थे मोटाराम नायक हमारे खेत का काम करता था; वह उसमे ही अपना भी थोडा-बहुत सामान रखता था* कच्ची पहली का कायदा और उसके पीछे लिखी दो बिल्लियों की कहानी भी मुझे सुनाया करता था मेरे चाचाजी व माँ भी मुझे कायदा पढाया करते थे माँ ने बताया था कि स्कूल में मेरा दाखिला मझले मामाजी ने कराया था.बाद में ओमप्रकाश जी जगरूप सिंह जी, सेवक सिंह संधू, भैराराम माकड़ के नाम मुझे याद है. सेवकसिंह जी व भैराराम जी की लिखावट से मै प्रभावित था. ओमप्रकाशजी सहयोगी  प्रकृति  के थे* उसके बाद मैं भानियावाला चला गया था*
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 15 जनवरी 2012

YAADEN(19) यादें(१9)

शायद मैं SCHOOL नहीं जाने लगा था उस वक़्त रायसिंहनगर का KUMAR BROTHERS PETROL PUMP नहीं था NEW LIGHT CINEMA के आस-पास भी सब खली ज़मीं थी दक्षिण दिशा में PS नहर से वर्तमान अनूपगढ़ ROAD, RAILWAY LINE और श्रीविजयनगर की तरफ बीच की सारी जगह में  ईंट भट्ठों के बड़े खदान थे और ये दोनों सड़कें नहीं थी. मेरी संभल में वहां ईंट भट्ठे चला करते थे. शहर से नानुवाला की तरफ दक्षिण को निकालने पर सबसे  आखिर में बाल की चाय की दुकान थी एक बार मैं पिताजी और बड़े मामाजी के साथ था. रायसिंहनगर  से लौटते समय बाल के ढाबे पर चाय पीने के दौरान बड़े मामाजी से कांच का गिलास टूट गया इस पर बाल ने खूब हंगामा किया पिताजी बार-बार बीच-बचाव करते हुए उसे समझा रहे थे की तुम अपने गिलास के पैसे ले लो*
बाल का ढाबा KUMAR BROTHERS PETROL PUMP से नहर की पुलिया पार करते ही दक्षिण पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख है* लगभग १९८० तक उसके सामने अजायबसिंह की चक्की थी*

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

YAADEN (18)यादें (१८)

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लोहड़ी का त्यौहार आने पर छोटे- बड़े बच्चे घर-घर से लोहड़ी मांगते थे - 
सुन्द्रिये- मुंदरिये हो ! ਸੁੰਦ੍ਰਿਏ  ਮੁੰਦਰੀਏ  ਹੋ !
तेरा कौन वचारा हो !! ਤੇਰਾ ਕੌਣ ਵਚਾਰਾ  ਹੋ !!
दुल्ला भट्ठी वाला हो !!! ਦੁੱਲਾ ਭਟ੍ਠੀ  ਵਾਲਾ ਹੋ !!!
दूल्ले धी विहाई हो !!!! ਦੁੱਲੇ ਧੀ ਵਿਹਾਈ  ਹੋ !!!!
प्राप्त लकड़ियों और मूंगफली आदि से गली में लोहड़ी जलाई जाती थी घर-घर में सब अपने -अपने पूर्वज-पितरों को ध्यान करके घर के सभी सदस्य अपने- अपने लकडियो के मुट्ठे अग्नि में डालते थे. हम बच्चों के लिए लोहड़ी की अग्नि में सुए गर्म करके मूंगफली, गज्जक, रेवाड़ी, पतासे, खोपरा, छुहारे, चीनी के मीठे व् रंग-बिरंगे खिलोने व कभी कभार बर्फी या सख्त किस्म की मिठाई पिरो कर हांर बनाये जाते थे, दुसरे दिन सुबह नहा कर नए कपडे व हर पहन कर सब घरों में जाकर बड़ों के चरण- स्पर्श करने होते थे. किसी बच्चे या दुल्हन की पहली लोहड़ी होने पर विशेष कर हार बनाये जाते थे. इस बार मैं अपनी दोनों बेटियों की शादी के बाद पहली लोहड़ी होने पर वैसे ही हांर बनाना चाहता था मगर 10-11 जनवरी की रात मेरे पिताजी की  चाची  (श्रीमती रामप्यारी) का इन्तेकाल हो जाने के कारन हमारे  सूतक लग  जाने से लोहड़ी नहीं जलानी है ! 
सूर्य देव के दक्षिणायन होने का त्यौहार अग्नि में नई लकड़ी,  नए चावल, नए तिल और गुड समर्पित करके; हम भारतीय उस ऊर्जा दाता भगवन भास्कर के, अपने इस उत्तरी गोलार्ध में लौटने पर; उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं ; इसी दिन के इंतज़ार में भीष्म पितामह 6 मास तक बाणों की शैया पर पड़े रहे थे ! 
सभी को सूर्य देव अपना बल और तेज प्रदान करें, इसी प्रार्थना के साथ-
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 8 जनवरी 2012

YAADEN(17) यादें(१७)

मेरे ननिहाल से पश्चिम व दक्षिण वाले बिश्नोई सुथार जाट बावरियों को मैं मामा /मामी नाना /नानी और हमारे घर से पूर्व पश्चिम व उत्तर को बसने वाले बावरी जटसिख रायसिख व रामदासियों  को चाचा/चाची कहता था चाचा ओमप्रकाश जी की शादी की मुझे पूरी याद है उससे पहले
हालत बिगड़ चुके थे शादी में हमारी शिरकत काफी कम थी अगरचे
जाती तौर पर हमारे घर उनका पूरा आना जाना था और मामा दीनानाथ आनंद के साथ वो खाना खाने भी आये थे रायसिंहनगर से डाक्टर मेघराज,दीनानाथ कोहली, सीताराम साबुनवाले व हुकमी उस शादी में आये थे. मुझे याद है कुतर की मशीन के हत्थे पर रखकर हुकमी ने गैस(PERTOMAX) जलाया और ड्योढ़ी के नीचे लटके सरिये में टांगा था; उस दूधिया तेज रौशनी में हम सब बच्चे खेल रहे थे !   
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      
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रविवार, 1 जनवरी 2012

YAADEN (16) यादें (१६)

होलाष्टक से पहले ही चंग की थाप सुनने लगती थी शाम से देर रात
तक बावरियो के मोहल्ले में धमाल मचता वहां देहाती किस्म के स्वांग लोगों के बारे में बनाये जाते थे एक दो बार मेरे पिताजी और चाचाजी के बारे में भी स्वांग बने थे पर इनका बुरा न मानकर हंसी ठट्ठे में लेते थे होली दाह की सिर्फ बातें सुनी थी झगडे के वहम से मुझे वहां जाने की मनाही थी ये इत्तेफाक है; की मैं आज तक नानुवाला की होली-दाह में शिरकत नहीं हुआ.
होली के दिन सारे गाँव में चंग काफिला सारे घरों में घूमता गता-बजाता 
था बाद में सब एक दूसरे से मिलने और राम-राम करने एक दूसरे के घरों में जाते थे. 
अंग्रेजी नव-वर्ष २०१२ की शुभकामनाएं !Photo: Pichkari ki Dhar,
Gulal ki bauchhar,
Apno ka pyar,
Yahi hai yaaron holi ka tyohar.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 25 दिसंबर 2011

YAADEN(15) यादें(१५)

नहर से खेतों में लगने वाले पानी के लिए पंचायती तौर पर हिसाब रखा जाता था इसके लिए मीराब चुना जाता था * उसे अमूमन दो पहर(छः घंटे ) पानी हर बारी का दिया जाता था* पूरी बारी में एक मुरब्बे को  पाँच या छः घंटे, नहर में पानी कम होने पर दूनी बारी, और नहर में पानी झारा होने पर एक बीघा भरने तक एक घंटा माना जाता था. पानी एक नाके  से दुसरे नाके तक दूर पानी ले जाने वाले काश्तकार भराई के रूप में एक मुरब्बा दूरी तक आधा घंटा भारी और लगते पानी के बाद पीछे किसी खेत में पानी तोड़ने पर निकाल के रूप में पाँच मिनट की कटाई.लोग अपनी ज़रुरत के मुताबिक एक दुसरे से पानी उधार लेन-देन करें या अपने ही किसी एक खेत का पानी किसी दुसरे खेत में लगावें सब हिसाब मीराब ही रखता था. एक बार हमारी दुकान के आगे कुछ लोग पानी के लेन-देन की चर्चा कर रहे थे, बातचीत के दरम्यान  बड़े मामा जी ने मीराब को कहा कि हम पहले अपने खेत में पानी लगा कर बाद में भरा भराया खाला बलराम गोदारा को दे देंगे.
और मैं सोच रहा था, कि पानी खेत में लगा लेने के बाद  ख़ाला भरा हुआ तो नहीं रहेगा; मामाजी ने उनके साथ चालाकी कर ली है.
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 18 दिसंबर 2011

YAADEN (14) यादें (१४)

शायद  मैं  5 या  6 साल  का  था . चाचाजी  श्री  बाल कृष्ण   और  बड़े  मामाजी  स्वर्गीय  श्री  वेद प्रकाश  ने  सिनेमा  देखने  रायसिंहनगर जाने का कार्यक्रम बनाया. मैं इनके साथ हो गया. मुझसे पीछा छुड़ाना मुश्किल होगया था. हम तीनो घर से चल कर नहर तक पहुँच गए. उस दिन नहर सूखी थी. पश्चिमी किनारे वाली दो बेरियों के नीचे हम तीनो खड़े थे. मैं नहर पार करने की जिद कर रहा था. चाचाजी ने चाल चली और मुझे कहा घर जाकर भरजाई (मेरी  माता) को कहो -चाय बनाओ, चाय बनाओ फिर चाय पीकर चलेंगे मैं वापस घर आकर माँ को  चाय बनाने के लिए कहने लगा तो माँ ने हँसकर मुझे गले लगा लिया और मैं समझ गया था की वे मुझे बेवकूफ बनाकर सिनेमा देखने चले गए. 
इस पहली ज्ञात बेवकूफी की याद अक्सर गुदगुदा जाती है.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

YAADEN (13) यादें (१३)

तक़रीबन स्कूल बनाने के वक़्त ही हमारे घरो के नोजवानो ने मंदिर बनाने का बीड़ा उठाया मेरे चाचा मामा उनके संगी साथी व हम उम्र इनमें बड़ी उम्र के ठाकुर बलवंत  सिंह जी को प्रधान बनाया गया नहर से मशरक  व  स्कुल  से  जनूब में बनाया गया दुसरे तबके के लोग भी कुछ हद तक इसमें शामिल थे. रोजाना सुबह-शाम के अलावा मंगल के रोज़ शाम को खास कीर्तन भजन में देर तक औरतें
बच्चे शिरकत करते थे* शुरू में पंडित पुरुषोत्तमदास जी पूजा पथ करते थे उनके दिल्ली चले जाने के बाद ठाकुर बलवंत सिंह जी, मनोहरलाल जी, बलदेव सिंह जी, जीवनसिंह जी, भी ईद जिम्मेवारी को निभाते रहे. जन्माष्टमी सालाना ज़लसे के तोर मनाई जाती थी महिना  भर  पहले मिटटी
गोबर की लिपाई औरते  शुरू  कर देती थीं
आदमी  कली व साफ सफाई करते कम उम्र  वाले झंडिया बनाते व लगते रायसिंहनगर से  PETROMAX व  केले के पेड़ लाये जाते पढ़ाकू बच्चे दीवारों पर अन्दर बहार मज़हबी व अदबी लिखावटें व चित्रकारी करते औरते मिलकर माम्दस्ते में मसाले कूटती भजन गाती और पंजीरी बनाती*
घरो से दरिया चादरें दुपट्टे व साडियां लाकर कृष्णजी का पलना सजाया जाता
तालीम याफ्ता व पदाकु जवान LOUDSPEAKAR मंगाया जाता शाम को सबसे पहले 
"आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ; झांकी हिंदुस्तान की !
इस मिटटी से तिलक करो; यह धरती है बलिदान की!!" 
बजाया जाता था*
रात को कंस और कृष्ण कीकथा होती आधी रात को चंद्रमा आने पर अर्घ्य देकर प्रसाद व चरणामृत बाँटते सरे बच्चे बहार खेलते सब तबकों के लोग कमोबेश उस
रात शिरकत करते थे --
दिवाली  पर  हर  घर से मंदिर व नहर  /डिग्गी पर एक दिया जलाया जाता था-
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
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रविवार, 4 दिसंबर 2011

YAADEN 12 यादें (१२)

मैं  SCHOOL कब जाने लगा? मुझे तो याद नहीं. माँ बताया करती थी की,
मैं SCHOOL जाने की जिद किया करता था. मामा केदारनाथजी ने मुझे भर्ती कराया था. मुझे याद है, नहर के पार पंचायत घर में SCHOOL लगता था. कई बार हम नहर के पास बबूल के पेड़ के नीचे बैठते थे.
बोरी घर से लेकर जाते थे. कभी कभी टाट-पट्टियाँ आ जाती थीं. आधी छुट्टी में उबला हुआ. गिलास घर से लेकर जाते थे. चौथी-पांचवी वाले ये काम करते थे. कुछ बच्चे फीका दूध पीते थे. कुछ घर से गुड, शक्कर या देसी खांड लाते थे. मेरे गिलास में मोटी दानेदार चीनी देखकर उनको अचरज होता था. वर्तमान स्थान पर सरपंच श्योकरण सहारण ने नीव रखी थी.  हम सब बच्चे प्रार्थना की मुद्रा में  हाथ जोड़े नहर से लकड़ी का पुल पार करके आये थे और हमें पातासों का प्रसाद  मिला था. सारा दृश्य आज भी मेरी आँखों में तैरता है. इस प्राथमिक विद्यालय से कई यादें जुडी हैं. एक हाल, एक सामान्य कमरा और एक छोटी रसोइनुमा कार्यालय और बड़ा सा खेल का मैदान बिना चारदीवारी. अब ये उच्च प्राथमिक है*
 जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
   

रविवार, 27 नवंबर 2011

YAADEN(11) यादें(११)

दादी जी (श्रीमती कुंती देवी शर्मा) के मुंह बोले भाई डाक्टर मेघराज अग्रवाल थे , वे भी कभी कभी चाचाजी (ओम प्रकाश शर्मा) के साथ साइकिल पर गाँव आ जाते थे. वे उनको मामा ही कहते थे. एकबारमुझे बुखार हुआ, इलाज के लिए माँ व् पिताजी के साथ रायसिंहनगर जाकर दादा दुर्गादास जी वाले अहाते के मकान   में रहे. दो  तीन दिन इलाज चला . उस ज़माने में बुखार का मतलब था रोटी बिलकुल बंद.  मेरा  जी कुलबुला रहा था. आखिर वैध जी ने अंगारी फुल्का, और मूंग धुली  दाल  खाने की इज़ाज़त दी, मुझे बड़ा कौतुहल था अंगारी फुल्के के बारे में. माँ ने बताया तो मेरी जिज्ञासा और भूख दोनों ही चरम पर पंहुच गई,  मैंने माँ का पीछा नहीं छोड़ा ,  माँ ने चूल्हा जलाया और मैं पास बैठ कर व्यग्रता से सूक्ष्म निरीक्षण करता रहा. 
आज न माँ है; न पिताजी; पर वह सारा घटनाक्रम और उस फुल्के का स्वाद आज भी ज़बान पर बरकरार है.  
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ 

रविवार, 20 नवंबर 2011

YAADEN (10) यादें (१०)

पिताजी  की चचेरी बहन कमलेश का अपने भाई-भाभी से काफी लगाव था और ये खलूस मेरे वाल्देन के इंतकाल तक ऐसे ही रहा* बुआ ने अफीम वाक़या से अपने भाई भाभी को वक़्त रहते आगाह कर दिया था,पर वो अनहोनी टल न सकी थी; उनकी शादी से पहले वो वाकया हो चुका था * शादी में मेरे वाल्देन व चाचा को शामिल नहीं किया गया* पिताजी ने रायसिंहनगर में जाकर बाराती रिश्तेदारों से मुलाकात की व अपनी बहन को विदा किया* ये हकीकी वाक़या भी मेरे होशो हवाश से पहले का ही है; जो घर में चलने वाली बातों के दरम्यान  ज़ाहिर हुआ बुआजी फूफाजी व उनके पिता बस्तीरामजी नानुवाला आने पर हमारे घर मिलने ज़रूर आते थे मुझे याद है* बस्तीराम जी की मौत के बाद वे अलवर से फरीदाबाद और फिर दिल्ली चले गए* फूफाजी गुजर गए: बुआजी का स्नेह आज भी मुझ पर बरक़रार है*  जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 13 नवंबर 2011

YAADEN(9) यादें(९)

आपसी रंजिश केचलते कश्मीरियों में गुटबाजी हो गई थी. मुंह में राम बगल में छुरी थी. पंडित रघुनाथदास मेरे पिताजी के विरोधी थे. हमारे
निजी रिश्तेदार अन्दर से उनके साथ थे. हमारी दुकान की सरकनों वाली छत के नीचे पिताजी ने बोरियों की पल्ली बाँधी थी ताकि चिड़िया सरकने ख़राब न करें. पिताजी की चचेरी बहन कमलेश ने एक शाम चुपके से आकर अपने भाई भाभी यानी कि मेरे वाल्देन को बताया कि कल सुबह पुलिस आकर इस बात की तलाशी लेगी आप अफीम बेचते हो. मेरे पिताजी चाचा बालकृष्ण व तीनो मामा और मेरी माँ ने घर दुकान तूड़ी के कोठों व पशुओं के बाड़े में में अफीम तलाश करना शुरू किया*
 पर देर रात तक भी अफीम नहीं मिली. ज्यादा रात बीतने पर बड़े मामाजी ने पिताजी को कहा कि लड़की ने आपको वहम में डाल  दिया है. इन्होने तलाशी बंद कर दी. सुबह पुलिस ने तलाशी ली तो कुछ नहीं मिला तब थानेदार ने छत वाली पल्ली उखडवाई तो उसमे से अफीम गिरी, छत में सुराख था. मेरे पिताजी को 15 रोज़ की जेल हुई. ये मेरी
होश से पहले  का वाकया है. माँ ने बताया जिस रोज़ सजा का ऐलान हुआ में पिताजी के कंधे से लिपटा था. पुलिस जब उनको लेजा रही थी तो में उनके कंधे से उतर नहीं रहा था.

अफीम वाकया मेंपिताजी को सजा होने के तकरीबन ही लगातार हमारी चार भैंसे मर गई माली  तौर पर भी काफी सदमा हुआ था पिताजी ने बड़े मामाजी को ज़ाहिर तौर पर कसूरवार तो नहीं ठहराया पर कभी कभार घरेलु गुफ्तगू में ये ज़िक्र करते थे की वेद न बोलता तो सारी पल्ली उखड जाती*
छत के सरकनों में सुराख़ तकरीबन1970 में पुरानी छत व दीवारें हटाकर नई बनाने तक कायम रहा मै अमूमन उस सुराख़ को गौर से देखा करता था
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

रविवार, 6 नवंबर 2011

YAADEN (8) यादें (८)

मेरी छोटी बहन सरोज के जन्म 1961से पहले दरम्याने मौसम की एक बोझिलऔर धुंधली शाम,घर व दुकान के बाहरी दरवाज़े बंद करके दुकान में मेरे वालिद खिड़की की तरफ पश्चिम को मुंह करके बैठे थे* माँ खिड़की के बाहर पूर्व 
को मुंह करके बैठी थी* माँ ने पड़ोस की तरफ हाथ करके कुछ बोला तो,पिताजी ने धीरे कुछ कहकर चुप करा दिया* मासूम व बेअक्ल  होने पर भी हालात की संजीदगी और अनहोनी मेरे ज़हन में आ गई थी * हमारे घरों में फूट व षड्यंत्रों की शायद वो पहली शब् थी; वो मंज़र अब तक मेरी आँखों में सरोबार है
 कलह का मरकज़ मेरे मझले मामा केदार नाथ थे* मगरचे उसकी ज़द में मेरे पिताजी आ गए थे पंडित रघुनाथदास,ठाकुर ज्ञानचंद व बड़े मामाजी के खास दोस्त दीनानाथ आनंद के ख्यालात से पिताजी की नाइत्तेफाकी थी 
अगरचे पंडित पुरुषोत्तम दास चेतराम मनोहरलाल ठाकुर संतराम बलवंतसिंह नारायणसिंह बलदेवसिंह चुनीलाल और खत्रियो में  धनीराम  भी मेरे वाल्देन से मुत्फिक थे पर ज़ाहिर तौर पर किसी की मुखालफत नहीं कर सके थे नतीजतन खत्रियो के हमारे दोनों घर मुकम्मल तौर पर अलग थलग हो गए थे * ज़ाहिर तौर पर दो धड़े बन गए पंडितो के दोनों बड़े घरो का एक धड़ाऔर खत्रियो के दो घरो का दूसरा धड़ा तकरीबन सारे राजपूत तो पंडितो के हक में थे ही; बाक़ी खत्री व हमारे जाती रिश्तेदार भी उसी तरफ थे* पिताजी की चाची रामप्यारी तो हमारे खिलाफत में थी ही, वालिद साहेब के मामा दुर्गादासजी भी उनके साथ थे* माँ पिताजीऔर नानी जी की मुखालफत को नज़र अंदाज़ करके; इन सबने पिताजी की चाची की चादरपोशी मेरे मझले मामा से करवाई* ये वाकया अपने निशानात छोड़कर मुख़्तसर ही ख़त्म हो गया* मेरे स्कूल दाखिले के वक़्त तक ये किस्सा तकरीबन ज़मिदोज़ हो गया था* मगरचे इसके नतीज़तन ज़ख्म बड़े गहरे हुए; मेरे वालदेंन और नानी को मरते दम तक इसका सदमा रहा*  
श्रीगुरु नानक देव जी ने फ़रमाया : -
 सोचे सोच न होइए!
 ਸੋਚੇ  ਸੋਚ  ਨਾ  ਹੋਈਏ !
 जे सोचे लख  वार !!
 ਜੇ  ਸੋਚੇ  ਲਖ   ਵਾਰ !!
जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
      

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

YAADEN (7) यादें (७)

मेरी दादी मोहतरमा बस्सी देवी, सख्त मिज़ाज, मज़हब-परस्त, मगर नेक दिल  घरेलु  औरत थीं*  हमारे कारोबार व घोड़ी-ताँगा हांकने वाले मुस्लमान कारिंदे थे*  सुबह सवेरे दरिया से नहा कर आते वक़्त;  खुदा न खास्ता सामने से उन पर किसी मुस्लमान की परछाई पड़ जाती; तो वापस दरिया पर जाकर आती* जंगल से आने वाली जलाऊ लकडिया धोकर इस्तेमाल करती थी* घर में आने वाले राशन में से हल्दी नमक चावल लकड़ी  वगैरा में से कुछ अलग से बचाकर रख लेती थी* जो तंगहाली या बरसात में इस्तेमाल करती थीं*  बिना उनकी इजाजत रसोई में दादाजी पिताजी या चाचाजी भी नहीं जा सकते थे * 1948 की भागम भाग से पहले ही उनका इंतकाल हो चुका था* 
मेरी नानी कौशल्या देवी, दादा दुर्गादास जी , गुरादित्तामल जी, बृजलाल जी, व मेरे छोटे दादा नन्दलाल जी की सास सीतादेवी और जम्मू रहने वाले सुंदरदास जी, कांगड़ा रहने वले भगतराम व बंसीलाल ये सब मेरी दादी के ममेरे/मौसेरे/फुफेरे भाई बहन लगते थे, इन साहेबान की ज़बानों से ही मुझे अपनी दादी के किस्सों का इल्म हुआ* इनमे से अब कोई भी मौजूद नहीं है*
अब जब कभी कोई बुजुर्गवार गुस्सा में  कुछ कहता है, तो  यूँ लगता है; जैसे उनमे से ही कोई मुझे ज़िन्दगी का फलसफा समझा रहा हो* 


जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ
       
   

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

YAADEN (6) यादें (६)

पंडित ताराचंद जी ज्योतिष के विद्वान् थे, वे अक्सर (मेरे रिश्ते के दादा) दुर्गादास जी के घर आया जाया करते थे. सफ़ेद पगड़ी, कश्मीरी पट्टू का गोल गले का कोट और सफ़ेद अचकन, हुक्का गुडगुडाते हुए, उनकी पचास बरस पुरानी  धुंधली  छवि मेरे मन में बसी है. उनकी माता  श्रीमती  मंगलो देवी को हमारे सारे घरों में, माजी का दर्ज़ा प्राप्त था. किसी भी घर में कोई  ख़ुशी का कारज हो तो, माजी को उनकी चारपाई  समेत लाया जाता  था. सारे काम  उनकी आज्ञा से होते थे. पंडित ताराचंद जी की  दो लड़कियों में से एक आज्ञादेवी पहले से  ही जम्मू में शादीशुदा थी , दूसरी कमला की शादी 
4LC , जैतसर के निकट  नानुवाला आने  व् पंडित जी के देहांत के बाद हुई थी. माजी का देहांत काफी बाद में हुआ था.  पंडित जी के छोटे भतीजे  श्री सुरेश लाल शर्मा  इस समय हनुमानगढ़ के प्रख्यात  ज्योतिषविद  माने जाते हैं. उनके बड़े  भतीजे  स्वर्गीय  श्री ओम प्रकाश शर्मा मेरे पिताजी की शादी के दोस्त थे, इस नाते  मैं उनको चाचा  तथा   माजी को मैं परदादी का दर्जा देता था. ये सिलसिला आज  55 साल  बाद भी यथावत है. उनकी माता श्रीमती कुंती देवी का आज भी मेरे प्रति पौत्र वाला स्नेह है.
श्री ऑमप्रकाश जी रायसिंहनगर में दुकान करते थे, शनिवार शाम को आते और सोमवार सवेरे जाते थे हमारी दुकान के सामने से गुज़रते वक़्त मुझे अक्सर आवाज़ लगते - बेटे चलना है ? और मैं दौड़ कर साइकिल की की अगली गद्दी पर बैठ जाता था. फिर दो तीन दिन   रायसिंहनगर  दादीजी के पास रहकर ही वापस आता था. 
वर्तमान दूरदर्शन relay centre से लगभग पूर्व की तरफ चार पांच कच्चे घर   दक्षिण को खुले हुए  थे; जिनमे दादा दुर्गादास जी, ध्यानचंद जी, के अहाते भी शामिल थे. उसके लगभग दक्षिण पूर्व को दाने भूने वाली भाठीयारनें, जिनमे से एक अब भी वहीँ बस अड्डे से पंचायत समिति को जाने वाली मुख्य सड़क पर पूर्व दिशा को खुलती दुकान है. उस ज़माने में नगर पालिका उससे लगभग उत्तर की ओर थी , उसके साथ सड़क पर नई नई टूटियां और पशुओं को पानी पिलाने की लम्बी हौदी बनी थी, जिसमे गावों से मंडी आने वाले लोग अपने ऊंठों को पानी पिलाते थे. उसके पश्चिम में श्री राम नाट्य क्लब की रामलीला होती थी जो अब भी बरक़रार है. 
इस रामलीला का मुझ पर  गहरा प्रभाव है. 1980 तक तो लगभग रोज शाम को हम 10 -15 साथी पैदल 10 किलोमीटर जाते और रात लगभग 1-2 बजे रामलीला देखकर वापस पैदल आते, सुबह फिर उठकर बस्ता कंधे पर टांग कर पैदल 4 किलोमीटर  25NP पढने जाते 1966  से 1970  नवरात्रों में हमारी नियमित दिनचर्या ऐसी थी. रामलीला के दो संस्मरण हैं- संभवतया १९६३ की बात हो सकती है मैं माँ से बिछुड़ कर (वर्तमान हनुमान मंदिर) सड़क पर इधर उधर देखता हुआ रोने लगा, पता नहीं कहाँ से चाचा जी आये और मुझे उठा लिया. दूसरा १९६८-७० और संभवतया उसके बाद भी सरदारगढ़ (सूरतगढ़) से रात आठ वाली रेलगाड़ी से बाकर अली  और उसका एक सरदार मित्र रामलीला देखने आते थे और दोनों एक दुसरे के नाम पर रामलीला में पैसे देते  थे.  मंच से इन दोनों के नाम सुनना बहुत अच्छा लगता था.       

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

YAADEN (5) यादें (५)

कश्मीर के बारे में मैंने अपने बचपन के दिनों में अपने घर में रात को लालटेन की रौशनी में अपने माता पिता, रिश्तेदारों और दुसरे बुजुर्गों को अक्सर चर्चा करते सुना है. मुज़फराबाद के आस पास सराय, चट्ठा, मीरपुर, हटिया, चकोठी, उडी, बागां, पलन्दरी  आदि स्थानों  में हमारे लोग रहते थे. १९४७ की आज़ादी के समय महाराजा हरिसिंह ने स्वतंत्र राज्य के रूप में रहने का फैसला किया. जवाहर लाल नेहरु महाराजा से बात करने गया, तो महाराजा ने नेहरु को अपने राज्य में घुसने नहीं दिया. नेहरु जी को कठुआ से वापस दिल्ली आना पड़ा. अगस्त १९४८ के आस पास पाकिस्तान ने अफगान कबाइलियों से कश्मीर में घुसपेंठ करवानी शुरू की. शेख मोहम्मद अब्दुला उस समय कश्मीर के प्रधान मंत्री थे. महाराजा ने भारत सरकार से मदद मांगी, तथा कश्मीर का भारत में विलय का प्रस्ताव दिया. गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने विलय का मसौदा तैयार करवाया. इसी बीच कबैलियो के हमले तेज हो गए और महाराजा ने राज्य का सञ्चालन शेख अब्दुल्ला व् उनके बहनोई गुलाम मोहम्मद को सौंप दिया, और खुद बम्बई चला गया. अक्तूबर १९४८ में कश्मीर लावारिस स्थिति में आ गया था. जवाहरलाल कश्मीर की मदद नहीं करना चाहते थे. शेख अब्दुल्ला और गुलाम मोहम्मद कबाइलियों को शाह और मात के तरीके से उलझाये रहे. कबाइलियों ने क्वाला और किशन गंगा के पुल काट दिए थे. सरदार पटेल ने अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए महाराजा पटियाला की सेनाओं को हवाई छतरियों से मुज़फराबाद के इलाके में उतारा. पटियाला की सेनाओं के आ जाने से गुरिल्ला छापे बंद होकर सीधी लड़ाई शुरू हो गई थी, उस समय कश्मीरियों ने पटियाला के सैनिको का भरपूर स्वागत और सहयोग किया. यहाँ तक कि काजू अखरोट वाली रोटियां घारों से बना कर पहुंचाई जाती थीं.    कबाइली पीछे हटने लगे तो पाकिस्तान ने मोर्चा खोल दिया भारतीय सेना ने सारे हालात को अपने काबू में कर लिया था कबाइली और पाकिस्तानी सेना पीछे हट रही थी.
उस समय नेहरु ने सरदार पटेल के साथ अपने मतभेदों और महाराजा हरीसिंह से बदला चुकाने के लिए ३ बड़ी गलतियाँ  कीं-
१- युद्ध विराम                                                   
२- यथा स्थिति अर्थात LINE  OF  CONTROL
३- संयुक्त राष्ट्र की निगरानी                            
जवाहरलाल नेहरु की जिद को आज भी राष्ट्र भुगत रहा है. सबसे ज्यादा पीड़ित हैं १९४८ में बेघर हुए हिन्दू कश्मीरियों के ५०० परिवार
और हमने करेले को नीम पर चढ़ा कर संविधान में अनुच्छेद ३७० रख दी भारत का कानून तब तक जम्मू कश्मीर में लागु नहीं होगा जब वहां की विधान सभा उसे मंज़ूर न कर ले? इसी का परिणाम है की जम्मू कश्मीर विधान सभा में अफज़ल के बारे में प्रस्ताव पेश होने जा रहा है. और कश्मीरी हिन्दू ६४ साल से तड़प रहे हैं. क्या भारत सरकार आज हमें वापस मुज़फराबाद के अपने मूल घरों में बसाने की हिम्मत रखती है ?  
जय हिंद جیہینڈ     ਜੈਹਿੰਦ
http://www.apnykhunja.blogspot.com/;

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

YAADEN (4)यादें (४)

 जम्मू कश्मीर सरकार ने प्रत्येक परिवार को ३५००/- रूपए पुनर्वास सहायता के रूप में देने की घोषणा की थी.  हमारे लोग  इसे क्लेम मानते रहे. इस रक़म को लेने के लिए भी  बहुत जोर आया. जल्लंधर में इसका केंद्रीय  भुगतान कार्यालय था. प्रत्येक परिवार के अलग कागज़ कभी जालंधर से और कभी जम्मू से अंग्रेजी में लिखा पढ़ी करनी पड़ती थी; जो काफी मुश्किल  काम था.   लगभग १००० या १२०० रुपये १९५२ में क़र्ज़ के रूप में दिए थे जो बाद में १९६४-६५ जब क्लेम मंज़ूर होने शुरू हुए तो  ब्याज समेत लगभग १५००-१८०० बन गए थे. उस समय भी एक मुश्त भुगतान नहीं दिया २०००/ में से क़र्ज़ व् ब्याज काटकर नकद दिए. बाकी  १५००/- रुपये के पांच साला बांड  दिए. 
कई बार ये अफवाहे आई कि क्लेम राशी ३५००/- से बढ़ा कर ३५०००/- की जा रही है.
१९४८-५२ के कश्मीरी हिन्दू शर्णार्थियो का सबसे बड़े दुर्भाग्य ये है कि कश्मीर का वो भू भाग जहाँ हमारे पूर्वज रहते थे; भारतीय संविधान के मुताबिक आज भी भारत में माना जाता है. और  संविधान लागु होने से आजतक उस क्षेत्र के लोक सभा सदस्यों के पद रिक्त रहते आये हैं. इसीलिए भारत सरकार ने न तो हमें शरणार्थी माना,  न ही पीछे छूटी सम्पतियो का कोई मुआवजा दिया. भारत सरकार कहती है, आप १९४८ से पहले भी भारत में थे; आज भी भारत में हो, इसलिए पाकिस्तान के विस्थापितों से तुलना मत करो. 
 व्यावहारिक धरातल का कटु सत्य है कि पाकिस्तान ने उसे अलग राज्य का दर्ज़ा देकर मुज़फराबाद को उसकी राजधानी बना रखा है. यह सब जवाहर लाल नेहरु की गलत नीतियों और महाराजा हरीसिंह तथा गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ मनमुटाव का परिणाम है.

जय हिंद جیہینڈ
जय हिंद جیہینڈ

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

YAADEN (3) यादें (३)

मेरे दादाजी किसी चक 36NP में  पुराने भट्ठे की खाली  को अलाट करवाना चाहते थे. इसी कारण वे अक्सर 6 मील दूर रायसिंह नगर कचहरी में पैदल आते जाते रहते थे. उस ज़माने में काली पीली भयंकर आंधियां चलती थी, टीलों भरा रास्ता था और पानी साथ लेकर जाना पड़ता था. ये हालात लगभग 1970 तक ऐसे ही रहे, हालाँकि बाद में १९६५ के आस पास 12TK व् सुनारों वाली ढाणी 28NP में जनसहयोग से डिग्गियां बन गई थीं.  1970 में रायसिंह नगर से श्रीबिजयनगर पक्की सड़क बनी, उस समय मैं 25NP में आठवीं में पढ़ता था.  
1954 की गर्मियों में मेरे दादाजी रायसिंहनगर कचहरी से वापस गाँव आ रहे थे. ठाकरी के पास ज़बरदस्त आंधी और प्यास से बेहाल होकर, एक खेजड़ी के नीचे बेहोश हो गए; समाचार मिलने पर मेरे पिता चाचा व् दूसरे  लोग पानी व् चारपाई लेकर गए, और उस दिन उनका देहांत हो गया. उसके बाद मेरे माता पिता की शादी हुई. मेरे जन्म के समय मेरे छोटे दादा नन्दलाल जी बीमार थे, वे किसी शुभ मुहूर्त में मुझे देखना चाहते थे. किन्तु इसी दरम्यान वे अपने पौत्र  का मुंह देखे बिना ही विदा हो गए.   मेरी माता अक्सर इस घटना क्रम का ज़िक्र करती रहती थीं.
  ਜੈਹਿੰਦ    جیہینڈ   जय हिंद

रविवार, 25 सितंबर 2011

YAADEN (2) यादें (२)

नानुवाला  में बसे कश्मीरी परिवारों को भारत सरकार ने २००/ रुपये तथा लगभग 50 x 60 वर्गफुट का एक एक अहाता दिया था . इसके अलावा 2 या 3 के परिवार को 12 बीघा 4 या ५ के परिवार को एक मुरब्बा 6 या 7 के परिवार को १.५ मुरब्बा  नहरी जमीन मिली थी .  चक 22NP 25NP, 33NP व 34NP में  बसने वाले सारे परिवार  ब्राह्मण   सिक्ख थे. जैतसर  के  पास2LC , 3LC  4LC में पलन्दरी के ब्राह्मण परिवार बसाये गए थे.        
रायसिंहनगर तहसील में 200 परिवार बसाये गए थे. बाकी  लगभग ३०० परिवार अलवर, जम्मू कांगड़ा, सहारनपुर देहरादून, ऋषिकेश,  दिल्ली आदि स्थानों में बसाये  गए या चले गए थे, वे अधिकांशतः खत्री थे.    फ़रवरी 1952 के बाद आने वाले परिवारों को कुछ भी सहायता नहीं मिली . नानकचंद  ओबेराय  का परिवार  बाद  में कांगड़ा  चला  गया था. 
नानुवाला  आने के बाद  सबसे  पहले  मेरे  नानाजी  हरिचंद  सेठी  का देहांत  हुआ  था. मेरे  दादा लाला देसराज गाँधी जी  के उपनाम से जाने जाते थे. उनको चक  37NP में मुरब्बा नंबर 21 अलाट हुआ  था . उनके  छोटे  भाई  नन्दलाल  जी नन्दोंशाह  के नाम  से  जाने  जाते  थे. उनको चक 37NP में मुरब्बा नंबर 16 व्  22 आधा आधा अलाट हुए थे .  मेरे नाना  जी को चक 36NP में   मुरब्बा नंबर 2 10 12 व 40 में  कुल 38 बीघे मिले थे. दुर्गादास जी ईशरदास जी गोकलीदेवी व धनीराम जी को   37NP में आधा आधा मुरब्बा और कृष्णलाल दीनानाथ को 36NP में        आधा मुरब्बा इसी तरह बाकी  सभी को भी ३६ या 37 NP में ज़मीनें  मिली  थीं . ज्ञानी गोकुलसिंह, सरनीदेवी, ध्यानचंद,प्रीतमसिंह, चरणसिंह, गुरादित्तामल बाद में आये थे, उन सबको किसी प्रकार की सहायता या ज़मीन नहीं मिली. उस वक़्त ये बताया गया था की ये ज़मीनें भारत सरकार  द्वारा निशुल्क दी गयी हैं. बाद में भारत सरकार, जम्मू-कश्मीर सरकार, और राजस्थान सरकार,  से झगडा चलता रहा. राजस्थान सरकार ने 1970 तक एक वर्षीय अस्थायी आवंटन के रूप में रखी और फिर भाखड़ा एवं गंग नहर भूमि   आवंटन नियम १९७० बनाकर,  पुख्ता आवंटन  300 रूपये बीघा की दर पर किया. 
मारे लोग इसे भारत सरकार का CLAIM समझते रहे और इस तरह कई परिवारों में अनावश्यक झगड़े भी हुए. 
राजस्थान काश्तकारी  अधिनियम 1955 पढने के बाद मुझे महसूस होता है  कि , हम लोग 21.02.1952 से जो ज़मीनें काश्त करते  थे; धारा 15 AAA के तहत 14.101955 को हम उसके अपने-आप ही खातेदार हो गए थे; तो भारत सरकार और राजस्थान सरकार ने लगातार हमारे साथ धोखा किया है; और 1970 के नियमों के तहत नया आवंटन आदेश जारी करना और कीमत वसूल करना ग़लत है।
जय हिंद جیہینڈ    ਜੈਹਿੰਦ  
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रविवार, 18 सितंबर 2011

YAADEN (1) यादें (१)

भारत सरकार ने 20  कश्मीरी परिवारों को 21, फरवरी १९५२ को नानुवाला में बसाया था; ऐसी चर्चा अक्सर हमारे घरों और रिश्तेदारियो में होती रहती थी. ब्राह्मणों में श्री पुरुषोत्तम दास (मदनलाल), श्री  ताराचंद जगन्नाथ, तीरथराम, मीरचंद ( चेतराम मनोहरलाल ), रघुनाथदास ( चुन्लीलाल पूरनचंद ) खत्रियों में हरिचंद सेठी ( वेदप्रकाश केदारनाथ सुभाष चन्द्र मेरे नाना मामा ), देसराज बांसल ( रामजीदास बालकृष्ण मेरे दादा पिता व चाचाजी ), नन्दलाल ( मदनलाल मेरे पिता के चाचाजी व चचेर भाई ) ; दुर्गादास ( मेरी दादीजी के मौसेर ) , ईशरदास बंसीलाल सहगल; गोकलीदेवी तुली ( सेवकराम रामलाल दूर के   रिश्ते से मेरे पिता की नानी ), धनीराम लाम्बा ( दूर के रिश्ते से मेरे पिता के मामा ), और कृष्णलाल दीनानाथ आनंद ; राजपूतों में गार्ड संतराम, लम्बरदार सूरमचंद, जीवनसिंह, ज्ञानचंद, बलदेवसिंह, ठाकरसिंह, बलवंतसिंह, लालदेवी,खत्रियों में गुरदित्तामल ( दूर के रिश्ते में मेरे पिता के मामा ) गोपालदास नानकचंद ओबेराय ( ईशरदास के ससुर-साला)  व राजपूतों में गोकुलसिंह ध्यानचंद नारायण सिंह, प्रीतमसिंह चरणसिंह बाद में आये थे
अक्सर घर में होने वाली चर्चाओं से मुझे पता लगा कि, अक्टूबर १९४८ में कबाइलियों ने  के मुज़फ्फराबाद इलाके पर हमला कर दिया था. उस वक़्त सब ने माना  था कि, दस बीस दिन जंगलों
 में छुप छुपा के सब वापस अपने अपने घरो में आ जायेंगे; पर कुदरत को ऐसा मंज़ूर नहीं  था. वे सब ५०० परिवार थे; जो भागते, दौड़ते; गिरते, पड़ते रावलपिंडी  के रास्ते लाहौर आकर DAV कॉलेज के शिविर में रहे. बाद में सरकारी तौर पर अमृतसर के रास्ते तत्कालीन पूर्वी पंजाब के काँगड़ा जिले के योल कैंप ( वर्तमान हिमाचल ) में फ़रवरी १९५२ तक रहे. बाद में जब मैं अंग्रेजी पढने लायक हुआ, तो हमारे घर में योल कैंप काँगड़ा के  राशन  कार्ड पर मैंने खुद सब कुछ पढ़ा था. उस पर COMPANY  COMMANDING  OFFICER गुरबचनसिंह के अंग्रेजी में हस्ताक्षर थे, और नानुवाला पहुँचाने कि तारीख़ २१.०२.१९५२ दर्ज थी.  वो कार्ड मैंने लगभग १९९० तक बहुत ही संभाल कर अपने दादा की निशानी के तौर पर रखा था.  बाद में नौकरी के तबादलों के दौरान वह ग़ुम हो गया. हो सकता है, अब भी  किसी गठरी में बंधा मिल जाये.

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ

शनिवार, 6 अगस्त 2011

DELHI BOLI देलही बोली

 सुना  है  कि  आमिर  खान  ने  नई  फिल्म  DELHI  BELLY में  युवा  वर्ग  को खूब   गालियाँ  परोसी  है. ये  बाज़ार  की मांग  हो  सकती  है, लेकिन  हम  अपने  देश  और  समाज  को किस  ओर  ले  जाना  चाहते  है ? क्या    सिनेमा  का  महत्त्व  केवल  बिकाऊपन होना  है
साहित्य  और संस्कृति  समाज  के  पथ  प्रदर्शक  होते  हैं . इसके  स्पष्ट  उदहारण रामानंद सागर की रामायण  और  बलदेवराज चोपड़ा  की महाभारत  हमारे  सामने  हैं जब  सड़कें  सूनी  हो जाया  करती  थीं . बारातों की  रवानगी बदल जाया करती थी. और हमारी युवा पीढी ने पिताश्री माताश्री भ्राताश्री भाभीश्री  जैसे  आदर सूचक शब्द सीखे.
अच्छी   बोली  अछे  समाज  का आइना  है. आओ  हम सब  मिलकर  अच्छा  सोचें  अच्छा   
 करें  अच्छा रहें . 

 जय   हिंद


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Ashok, Tehsildar Hanumamgarh 9414094991
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शनिवार, 2 जुलाई 2011

GUTUR-GU

कर्णाटक  में  हंसराज  भारद्वाज , उत्तर प्रदेश   में  मोतीलाल   वोरा  , बिहार  में  बूटा  सिंह  हो  या  फिर  हरयाणा , आंध्र  प्रदेश  लगभग  हर  प्रदेश  में  राजभवन  की  गुटुर  गू  केवल  केंद्र  की  सत्ता  के  अनुसार  चलती  है . अपने  प्रदेश  की  जनता  द्वारा  कूड़ेदान   में  फेंके  गए  OUTDATED मोहरों  से  केंद्र  का  सत्ताधारी  दल  दूसरे  प्रदेशो  के  मुख्यमंत्रियों  की  नाक  में  नकेल  डलवाता  है . गैर  राजनीतिक   व्यक्तियों  को  जब  जब  भी  राज्यपाल  बनाया  गया , उन्होंने  हमेशा   जनहित  को  ही  प्रमुखता  दी  है . किन्तु  राजनीती  के  पिटे          हुए  मोहरों  ने  हमेशा लोकतंत्र का गला ही घोटा है, और विलासिता का जीवन जिया है.
क्या ये लोकतंत्र है ?
जरा सोचें !!

जयहिंद 

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

BHARAT RATNA

LET WE INTRODUCE. MY SELF THE NOMINEE FOR THE "BHARAT RATNA AWARD" YEAR 420 BC.
< ¤MY RESUME¤>
¤ 1> LUXURIOUS FAMILY WITH POLITICAL & DIPLOMATIC BACKGROUND.
¤ 2> POLICE OR PARAMILITARY FORCES NEVER DARE TO DISTURB MY JOBS.
¤ 3> I HAVE ABILITY TO WIN ANY MATCH OR ELECTION.
¤ 4> I HAVE A NUMEROUS RATING AT TV, ELECTRONIC MEDIA & SMS.
¤ 5> I AM EMPOWERED WITH DEVINE SPEACH TO HYPNOTISE THE AUDIONS.
¤ 6> I ACCEPT ALL KIND OF DONATIONS.

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

I am the PRIME MINISTER

http://apnybaat.blogspot.in/2011/03/i-am-prime-minister.html
IF I WERE THE PRIME MINISTER OF INDIA; MY PRIORITIES MAY BE -

¤ 1> COMPLY ALL THE ORDERS OF THE COURTS AGAINST THE TERRERISTS.
¤ 2> DAMAGE OF THE PUBLIC PROPERTY SHOULD BE RECOVERED.

¤ 3> NO RESERVATION ON COMMUNAL OR CASTE BASE.
¤ 4>FAMILY CONTROLL COMPULSORY.

¤ 6> NO AUTO VEHICLES OR MOBILE PHONES, FOR STUDENTS IN THE CAMPUS.
¤ 7> CLASS 11TH SHOULD BE BASED ON PRACTICALS SOCIAL SERVICE NATIONAL SERVICE & FIELD TRAINING.
¤ 8> DRESS CODE COMPULSORY FOR ALL STUDENTS.

¤ 8>LINKAGE OF RIVERS.
¤ 9>WASTAGE MANAGEMENT & RAINWATER RESERVOIR IN EACH PLOT ABOVE 150 SQUIRE YARDS.

¤10> NO AID OR SUBCIDY TO PRIVATE SCHOOLS OR HOSPITALS.
¤11> UNIQUE ELECTORAL ROLL FOR ALL TYPE OF ELECTIONS.
¤ 12> ARTICLE 370 OF THE CONSTITUTION SHOULD BE DELETED.
¤ 13> LOCAL LABOUR & LOCAL PRODUCTION SHOULD BE ENCOURAGEDhttp://apnykhunja.blogspot.in/2011/04/vote-me.html