रविवार, 25 सितंबर 2011

YAADEN (2) यादें (२)

नानुवाला  में बसे कश्मीरी परिवारों को भारत सरकार ने २००/ रुपये तथा लगभग 50 x 60 वर्गफुट का एक एक अहाता दिया था . इसके अलावा 2 या 3 के परिवार को 12 बीघा 4 या ५ के परिवार को एक मुरब्बा 6 या 7 के परिवार को १.५ मुरब्बा  नहरी जमीन मिली थी .  चक 22NP 25NP, 33NP व 34NP में  बसने वाले सारे परिवार  ब्राह्मण   सिक्ख थे. जैतसर  के  पास2LC , 3LC  4LC में पलन्दरी के ब्राह्मण परिवार बसाये गए थे.        
रायसिंहनगर तहसील में 200 परिवार बसाये गए थे. बाकी  लगभग ३०० परिवार अलवर, जम्मू कांगड़ा, सहारनपुर देहरादून, ऋषिकेश,  दिल्ली आदि स्थानों में बसाये  गए या चले गए थे, वे अधिकांशतः खत्री थे.    फ़रवरी 1952 के बाद आने वाले परिवारों को कुछ भी सहायता नहीं मिली . नानकचंद  ओबेराय  का परिवार  बाद  में कांगड़ा  चला  गया था. 
नानुवाला  आने के बाद  सबसे  पहले  मेरे  नानाजी  हरिचंद  सेठी  का देहांत  हुआ  था. मेरे  दादा लाला देसराज गाँधी जी  के उपनाम से जाने जाते थे. उनको चक  37NP में मुरब्बा नंबर 21 अलाट हुआ  था . उनके  छोटे  भाई  नन्दलाल  जी नन्दोंशाह  के नाम  से  जाने  जाते  थे. उनको चक 37NP में मुरब्बा नंबर 16 व्  22 आधा आधा अलाट हुए थे .  मेरे नाना  जी को चक 36NP में   मुरब्बा नंबर 2 10 12 व 40 में  कुल 38 बीघे मिले थे. दुर्गादास जी ईशरदास जी गोकलीदेवी व धनीराम जी को   37NP में आधा आधा मुरब्बा और कृष्णलाल दीनानाथ को 36NP में        आधा मुरब्बा इसी तरह बाकी  सभी को भी ३६ या 37 NP में ज़मीनें  मिली  थीं . ज्ञानी गोकुलसिंह, सरनीदेवी, ध्यानचंद,प्रीतमसिंह, चरणसिंह, गुरादित्तामल बाद में आये थे, उन सबको किसी प्रकार की सहायता या ज़मीन नहीं मिली. उस वक़्त ये बताया गया था की ये ज़मीनें भारत सरकार  द्वारा निशुल्क दी गयी हैं. बाद में भारत सरकार, जम्मू-कश्मीर सरकार, और राजस्थान सरकार,  से झगडा चलता रहा. राजस्थान सरकार ने 1970 तक एक वर्षीय अस्थायी आवंटन के रूप में रखी और फिर भाखड़ा एवं गंग नहर भूमि   आवंटन नियम १९७० बनाकर,  पुख्ता आवंटन  300 रूपये बीघा की दर पर किया. 
मारे लोग इसे भारत सरकार का CLAIM समझते रहे और इस तरह कई परिवारों में अनावश्यक झगड़े भी हुए. 
राजस्थान काश्तकारी  अधिनियम 1955 पढने के बाद मुझे महसूस होता है  कि , हम लोग 21.02.1952 से जो ज़मीनें काश्त करते  थे; धारा 15 AAA के तहत 14.101955 को हम उसके अपने-आप ही खातेदार हो गए थे; तो भारत सरकार और राजस्थान सरकार ने लगातार हमारे साथ धोखा किया है; और 1970 के नियमों के तहत नया आवंटन आदेश जारी करना और कीमत वसूल करना ग़लत है।
जय हिंद جیہینڈ    ਜੈਹਿੰਦ  
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रविवार, 18 सितंबर 2011

YAADEN (1) यादें (१)

18/09/2011
भारत सरकार ने 20  कश्मीरी परिवारों को 21, फरवरी १९५२ को नानुवाला में बसाया था; ऐसी चर्चा अक्सर हमारे घरों और रिश्तेदारियो में होती रहती थी. ब्राह्मणों में श्री पुरुषोत्तम दास (मदनलाल), श्री  ताराचंद जगन्नाथ, तीरथराम, मीरचंद ( चेतराम मनोहरलाल ), रघुनाथदास ( चुन्लीलाल पूरनचंद ) खत्रियों में हरिचंद सेठी ( वेदप्रकाश केदारनाथ सुभाष चन्द्र मेरे नाना मामा ), देसराज बांसल ( रामजीदास बालकृष्ण मेरे दादा पिता व चाचाजी ), नन्दलाल ( मदनलाल मेरे पिता के चाचाजी व चचेर भाई ) ; दुर्गादास ( मेरी दादीजी के मौसेर ) , ईशरदास बंसीलाल सहगल; गोकलीदेवी तुली ( सेवकराम रामलाल दूर के   रिश्ते से मेरे पिता की नानी ), धनीराम लाम्बा ( दूर के रिश्ते से मेरे पिता के मामा ), और कृष्णलाल दीनानाथ आनंद ; राजपूतों में गार्ड संतराम, लम्बरदार सूरमचंद, जीवनसिंह, ज्ञानचंद, बलदेवसिंह, ठाकरसिंह, बलवंतसिंह, लालदेवी,खत्रियों में गुरदित्तामल ( दूर के रिश्ते में मेरे पिता के मामा ) गोपालदास नानकचंद ओबेराय ( ईशरदास के ससुर-साला)  व राजपूतों में गोकुलसिंह ध्यानचंद नारायण सिंह, प्रीतमसिंह चरणसिंह बाद में आये थे
अक्सर घर में होने वाली चर्चाओं से मुझे पता लगा कि, अक्टूबर १९४८ में कबाइलियों ने  के मुज़फ्फराबाद इलाके पर हमला कर दिया था. उस वक़्त सब ने माना  था कि, दस बीस दिन जंगलों
 में छुप छुपा के सब वापस अपने अपने घरो में आ जायेंगे; पर कुदरत को ऐसा मंज़ूर नहीं  था. वे सब ५०० परिवार थे; जो भागते, दौड़ते; गिरते, पड़ते रावलपिंडी  के रास्ते लाहौर आकर DAV कॉलेज के शिविर में रहे. बाद में सरकारी तौर पर अमृतसर के रास्ते तत्कालीन पूर्वी पंजाब के काँगड़ा जिले के योल कैंप ( वर्तमान हिमाचल ) में फ़रवरी १९५२ तक रहे. बाद में जब मैं अंग्रेजी पढने लायक हुआ, तो हमारे घर में योल कैंप काँगड़ा के  राशन  कार्ड पर मैंने खुद सब कुछ पढ़ा था. उस पर COMPANY  COMMANDING  OFFICER गुरबचनसिंह के अंग्रेजी में हस्ताक्षर थे, और नानुवाला पहुँचाने कि तारीख़ २१.०२.१९५२ दर्ज थी.  वो कार्ड मैंने लगभग १९९० तक बहुत ही संभाल कर अपने दादा की निशानी के तौर पर रखा था.  बाद में नौकरी के तबादलों के दौरान वह ग़ुम हो गया. हो सकता है, अब भी  किसी गठरी में बंधा मिल जाये.

जय हिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ